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अनन्त इच्छा

अनन्त इच्छा

इच्छा हु आगाससमा अणंतया

इच्छा आकाश के समान अनन्त होती है

हम दुःखी क्यों हैं|

इसलिए कि हम कुछ चाहते हैं|

इसका अर्थ?

अर्थ यही कि इच्छा स्वयं दुःख है! Continue reading “अनन्त इच्छा” »

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अदत्तादान और लोभ

अदत्तादान और लोभ

लोभाविले आययइ अदत्तं

लोभ से कलुषित जीव अदत्तादान (चोरी) करता है

जो वस्तु दे दी जाती है, वह दत्त है और जो नहीं दी गयी, वह अदत्त है| सज्जन केवल दत्त वस्तु को ही ग्रहण करना उचित समझते हैं, अदत्त वस्तु को नहीं| Continue reading “अदत्तादान और लोभ” »

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अड़ियल टट्टू

अड़ियल टट्टू

मा गलियस्सेव कसं, वयणमिच्छे पुणो पुणो

बार बार चाबुक की मार खाने वाले गलिताश्‍व (अड़ियल टट्टू) की तरह कर्तव्यपालन के लिए बार-बार गुरुओं के निर्देश की अपेक्षा मत रखो

नित्य करने के लिए जो कर्त्तव्य निर्दिष्ट हो, उसे बिना कहे स्वयं प्रेरणा से प्रतिदिन करते रहने में ही शिष्य की शोभा है| विवेकी सुविनीत शिष्य ऐसा ही करते हैं और अपने गुरुओं के हृदय में स्थान पा लेते हैं| Continue reading “अड़ियल टट्टू” »

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अकिंचनता का अनुभव

अकिंचनता का अनुभव

तण्हा हया जस्स न होइ लोहो,
लोहो हओ जस्स न किंचणाइ

जिसमें लोभ नहीं होता, उसकी तृष्णा नष्ट हो जाती है और जो अकिंचन है, उसका लोभ नष्ट हो जाता है

‘किंचन’ का अर्थ है – कुछ| जो समझता है कि इस दुनिया में अपना कुछ नहीं हैं, जो सोचता है कि जन्म लेते समय हम अपने साथ कोई वस्तु नहीं लाये थे और मरते समय भी अपने साथ कुछ आने वाला नहीं है – सारा धन, खेत, मकान आदि यहीं छूट जाने वाले हैं – जो जानता है कि आत्मा के अतिरिक्त समस्त वस्तुएँ जड़ हैं – क्षणभंगुर हैं, वही ‘अकिंचन’ है| Continue reading “अकिंचनता का अनुभव” »

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अदीनभाव से रहो

अदीनभाव से रहो

अदीणमणसो चरे
विनय गुण है; परन्तु दीनता दोष है| विनीत विवेकशील होता है| वह अपने से अधिक ज्ञानियों के सामने सदा नम्र रहता है, जिससे कि वह उनसे ज्ञान-लाभ पा सके| Continue reading “अदीनभाव से रहो” »

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असली और नकली

असली और नकली

राढामणी वेरुलियप्पगासे,
अमहग्घए होइ हु जाणएसु

वैडूर्यरत्न के समान चमकने वाले काच के टुकडे का, जानकारों के समक्ष कुछ भी मूल्य नहीं है

नकली मोती असली मोती से अधिक चमकीला होता है; परन्तु यह वह मूल्य में असली मोती की बराबरी कभी नहीं कर सकता | जानकार दोनों का अन्तर समझ ही लेते हैं| Continue reading “असली और नकली” »

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क्रिया में रुचि

क्रिया में रुचि

किरियं च रोयए धीरो

धीर पुरुष क्रिया में रुचिवाला होता है

बच्चा इसलिए दूध नहीं पीता कि दूध से शरीर को पोषण मिलता है| वह तो केवल इसलिए पीता है कि उसे दूध मीठा लगता है, भाता है| Continue reading “क्रिया में रुचि” »

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सुखद और दुःखद

सुखद और दुःखद

खणमित्तसुक्खा बहुकालदुक्खा

विषयभोग क्षणमात्र सुख देते हैं, किंतु बहुकाल पर्यन्त दुःख देते हैं

दिन के बाद रात और रात के बाद दिन अथवा अँधेरे के बाद उजाला व उजाले के बाद अँधेरा क्रम से आता रहता है, उसी प्रकार सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख का आगमन जीवन में होता रहता है – अनुकूल परिस्थितियॉं पा कर कभी हम हँसते हैं तो प्रतिकूल परिस्थितियॉं पा कर रोते भी हैं| Continue reading “सुखद और दुःखद” »

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स्वाध्याय से लाभ

स्वाध्याय से लाभ

सज्झाएणं नाणावरणिज्जं कम्मं खवेइ

स्वाध्याय से ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है

स्वाध्याय का साधारण अर्थ है – वीतरागप्रणीत शास्त्रों का अध्ययन करना| इससे उन कर्मों का क्षय होता है, जो ज्ञान पर आवरण डाले हुए हैं| ज्यों-ज्यों हम स्वाध्याय करते जायेंगे, त्यों-त्यों ज्ञानीवरणीय कर्म क्षीण होते जायेंगे और धीरे-धीरे हमें पूर्ण ज्ञान या सर्वज्ञत्व प्राप्त हो जायेगा| Continue reading “स्वाध्याय से लाभ” »

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दुर्लभ श्रद्धा

दुर्लभ श्रद्धा

श्रद्धा परमदुल्लहा

श्रद्धा अत्यन्त दुर्लभ है

धर्म पर श्रद्धा हो तो मनुष्य स्वार्थ का विचार किये बिना भी अपने कर्तव्य पर आरूढ़ हो सकता है| परन्तु यह श्रद्धा हो कैसे ? उसका आचार क्या हो ? Continue reading “दुर्लभ श्रद्धा” »

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