विहुणाहि रयं पुरे कडं
पूर्व सञ्चित कर्म रूप रज को साफ करो
पूर्व सञ्चित कर्म रूप रज को साफ करो
स्वाध्याय से ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है
क्रोधविजय क्षमा का जनक है
जीवन और रूप विद्युत् की गति के समान चंचल होते हैं
हितकर सच्ची बात कहनी चाहिये
अध्ययन किये गये वेद रक्षा नहीं कर सकते
तपश्चरण तलवार की धार पर चलने के समान दुष्कर है
जो खा-पीकर आराम से सोता है, वह पापश्रमण कहलाता है
आत्मा ही सुख दुःख का कर्त्ता और भोक्ता है
हम अच्छे कार्य करते हैं; तो अपने लिए सुख का निर्माण करते हैं और यदि बुरे कार्य करते हैं; तो दुःख का निर्माण करते हैं| इस प्रकार हम स्वयं ही सुख-दुःख के निर्माता हैं, बनाने वाले हैं| Continue reading “कर्त्ता – भोक्ता” »
अनुशासन से क्रुद्ध नहीं होना चाहिये