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समय पर काम करें

समय पर काम करें

काले कालं समायरे

समय पर समयोचित कार्य करना चाहिये

हम भूख लगने पर पानी नहीं पीते और प्यास लगने पर भोजन नहीं करते; क्यों कि ऐसा करना अनुचित है| इसी प्रकार खेलने के समय खाना, खाने के समय पढ़ना या पढ़ने के समय खेलना भी अनुचित है| Continue reading “समय पर काम करें” »

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तपस्या और जाति

तपस्या और जाति

सुक्खं खु दीसइ तवोविसेसो,
न दीसई जाइविसेस कोई

तपविशेष तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है, परन्तु कोई जातिविशेष नहीं दिखाई देता

तपस्या से शरीर में जो कृशता पैदा हो जाती है, उसे देखने से पता चल जाता है कि अमुक व्यक्ति तपस्वी है या नहीं| तपस्या से तपस्वी का तन भले ही क्षीण हो; परन्तु मन क्षीण नहीं होता| Continue reading “तपस्या और जाति” »

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इच्छानिरोध

इच्छानिरोध

छंदं निरोहेण उवेइ मोक्खं

इच्छाओं को रोकने से ही मोक्ष प्राप्त होता है

इच्छाएँ अनन्त हैं| एक इच्छा को पूरी करें; तो दूसरी पैदा हो जाती है| फिर दूसरी के बाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथी और चौथी के बाद पॉंचवी अर्थात् एक के बाद एक इच्छा उत्पन्न होती ही रहती है | प्राणी उसकी पूर्ति को लिए दौड़धूप करता ही रहता है और एक दिन अन्तिम सॉंस छोड देता है| Continue reading “इच्छानिरोध” »

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विरक्त साधक

विरक्त साधक

विरता हु न लग्गंति,
जहा से सुक्कगोलए

मिट्टी के सूखे गोले के समान विरक्त साधक कहीं भी चिपकता नहीं है

मिट्टी का गीला गोला यदि दीवार पर फैंका जाये; तो वह दीवार से चिपक जायेगा; क्यों कि जल से मिट्टी में चिपकने का गुण पैदा हो जाता है| Continue reading “विरक्त साधक” »

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अनुभव से सच्चाई खोजो

अनुभव से सच्चाई खोजो

अप्पणा सच्चमेसेज्जा

स्वयं सत्यान्वेषण करना चाहिये

कहावत है – ‘‘मुण्डे मुण्डे मतिर्भिना’’ अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि अलग-अलग होती है, इसलिए प्रत्येक के विचार भी अलग-अलग होते हैं| Continue reading “अनुभव से सच्चाई खोजो” »

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गुणाकांक्षा

गुणाकांक्षा

कङ्खे गुणे जाव सरीरभेऊ

जब तक शरीरभंग (मृत्यु) न हो तब तक गुणाकांक्षा रहनी चाहिये

जब तक शरीर नष्ट नहीं हो जाता अर्थात् मृत्यु नहीं हो जाती, तब तक हमें निरन्तर गुणों की कामना करते रहना चाहिये|

विषयों की तो सभी प्राणी कामना करते रहते हैं; किंतु विवेकी व्यक्ति गुणों की कामना करते हैं| Continue reading “गुणाकांक्षा” »

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ममता का बन्धन

ममता का बन्धन

ममत्तं छिंदए ताए, महानागोव्व कंचुयं

आत्मसाधक ममत्व के बन्धन को तोड़ फेंके; जैसे महानाग कञ्चुक को उतार देता है

सॉंपों के शरीर पर एक झिल्लीदार पतला चमड़ा होता है, जो हर साल गिर जाता है| उसे संस्कृत में कंचुक और हिन्दी में केंचुली कहते हैं| अजगर जिस प्रकार वर्षभर तक एक केंचुली की खोज में रहकर भी उसके प्रति आसक्ति नहीं रखता और ज्यों ही वर्ष समाप्त होता है, वह तत्काल अपनी केंचुली छोड़ कर अन्यत्र चला जाता है| Continue reading “ममता का बन्धन” »

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कामासक्ति को छोड़िये

कामासक्ति को छोड़िये

कामाणुगिद्धिप्पभवं खु दुक्खं

निश्‍चयपूर्वक कहा जा सकता है कि दुःख कामासक्ति से उत्प होता है

दुःख का जन्म कहॉं होता है ? कामना के क्षेत्र में; इच्छा की भूमि पर| जहॉं कामनाएँ हैं, विविध विषयों को प्राप्त करने की लालसाएँ हैं; वहॉं शान्ति का अस्तित्व कैसे रह सकता है ? Continue reading “कामासक्ति को छोड़िये” »

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भवतृष्णा का त्याग

भवतृष्णा का त्याग

भवतण्हा लया वुत्ता, भीमा भीमफलोदया

संसार की तृष्णा भयंकर फल देनेवाली एक भयंकर लता है

भवतण्हा तृष्णा अर्थात् संसार के प्रति आसक्ति एक लता है – ऐसी भयंकर लता, जिसमें भयंकर फल उत्प होते हैं| Continue reading “भवतृष्णा का त्याग” »

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कृत – अकृत

कृत   अकृत

कडं कडेत्ति भासेज्जा, अकडं नो कडेत्ति य

किये हुए को कृत और न किये हुए को अकृत कहना चाहिये

इस सूक्ति में यथार्थ वचन का स्वरूप समझाया गया है| गुरु के सन्मुख विनयभाव का सूचन करते हुए आपने जो काम किया हुआ है, वह ‘कृत’ है और जो काम नहीं किया हुआ है, वह अकृत है| जो कृत है उसे कृत कहा जाये और जो अकृत है, उसे अकृत| Continue reading “कृत – अकृत” »

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