असंजमे नियत्तिं च, संजमे य पवत्तणं
असंयम से निवृत्ति और संयम में प्रवृत्ति होनी चाहिये
असंयम से निवृत्ति और संयम में प्रवृत्ति होनी चाहिये
किसी भी अन्य जीव को त्रास मत दो
बुद्धिमान ज्ञान पा कर नम्र हो जाता है
सिंह के समान निर्भीक; केवल शब्दों से न डरिये
करणसत्य में रहनेवाला जीव जैसा बोलता है, वैसा ही करता है
वीतरागता से स्नेह औ तृष्णा के बन्धन कट जाते हैं
ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों त्यों लोभ होता है और लाभ से लोभ बढ़ता रहता है
सफलता से उत्साह बढ़ता है और विफलता से वह नष्ट हो जाता है| Continue reading “लाभ और लोभ” »
निरर्थक शिक्षा छोड़कर सार्थक शिक्षा ही ग्रहण करें
राग-द्वेष के क्षय से जीव एकान्तसुखस्वरूप मोक्ष को प्राप्त करता है
सद्गुण-साधना का कार्य भुजाओं से समुद्र तैरने के समान है