सिंह के समान निर्भीक; केवल शब्दों से न डरिये
सिंह-सी निर्भयता
सीहो व सद्देण न संतसेज्जा
सिंह कितना निर्भय होता है! हाथी की चिंघाड़ से भी वह नहीं डरता| यद्यापि हाथी के शरीर से उसका शरीर बहुत छोटा होता है; फिर भी उसकी साहसिकता – उसकी वीरता उसमें प्रशंसनीय निर्भयता के भाव जगा देती है, जिससे कि वह चिंघाड़ के प्रति भी लापरवाह बन जाता है| इसी प्रकार वीर पुरुष भी शत्रुओं की ललकार से नहीं डरते; जो डर जाते हैं, वे वीर नहीं कायर हैं| Continue reading “सिंह-सी निर्भयता” »
यथावादी तथाकारी
करणसच्चे वट्टमाणे जीवे
जहावाई तहाकारी या वि भवइ
जहावाई तहाकारी या वि भवइ
करणसत्य में रहनेवाला जीव जैसा बोलता है, वैसा ही करता है
स्नेह और तृष्णा
वीयरागयाएणं नेहाणुबंधणाणि,
तण्हाणुबंधणाणि य वोच्छिन्दइ
तण्हाणुबंधणाणि य वोच्छिन्दइ
वीतरागता से स्नेह औ तृष्णा के बन्धन कट जाते हैं
लाभ और लोभ
जहा लाहो तहा लोहो, लाहा लोहो पवड्ढइ
ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों त्यों लोभ होता है और लाभ से लोभ बढ़ता रहता है
सफलता से उत्साह बढ़ता है और विफलता से वह नष्ट हो जाता है| Continue reading “लाभ और लोभ” »
सच्ची शिक्षा
अट्ठजुत्ताणि सिक्खिज्जा,
निरट्ठाणि उवज्जए
निरट्ठाणि उवज्जए
निरर्थक शिक्षा छोड़कर सार्थक शिक्षा ही ग्रहण करें
राग द्वेष का क्षय
रागस्स दोसस्स य संखएणं
एगंतसोक्खं समुवेइ मोक्खं
एगंतसोक्खं समुवेइ मोक्खं
राग-द्वेष के क्षय से जीव एकान्तसुखस्वरूप मोक्ष को प्राप्त करता है
सद्गुण साधना
बाहाहिं सागरो चेव,
तरियव्वो गुणोदहिं
तरियव्वो गुणोदहिं
सद्गुण-साधना का कार्य भुजाओं से समुद्र तैरने के समान है
राग द्वेष के कारण
रागस्स हेउं समणुमाहु,
दोसस्स हेउं अमणुमाहु
दोसस्स हेउं अमणुमाहु
मनोज्ञ शब्दादि राग के और अमनोज्ञ द्वेष के कारण कहे गये हैं
कोमल प्रशंसात्मक शब्द हमें अच्छे लगते हैं और कठोर निन्दात्मक शब्द बुरे| Continue reading “राग द्वेष के कारण” »
विज्ञान और धर्म
विण्णए समागम्म धम्मसाहणमिच्छिउं
धर्म के साधनों का विज्ञान से समन्वय करना चाहिये
पापी की पीड़ा
सकम्मुणा किच्चइ पावकारी
पाप करनेवाला अपने ही कर्मों से पीड़ित होता है


















