विणए ठविज्ज अप्पाणं, इच्छंतो हियमप्पणो
आत्महितैषी साधक अपने को विनय में स्थिर करे
आत्महितैषी साधक अपने को विनय में स्थिर करे
सांसारिक जीव क्रमशः शुद्ध होते हुए मनुष्यभव पाते हैं
सम्यक्त्व के अभाव में चारित्र नहीं हो सकता
आत्मा आदि अमूर्त्त तत्त्व इन्द्रियग्राह्य नहीं होते और जो अमूर्त्त होते हैं, वे नित्य भी होते हैं
ज्ञानी और सदाचारी मृत्युपर्यन्त त्रस्त (भयाक्रान्त) नहीं होते
बिना पूछे कुछ भी नहीं बोलना चाहिये और पूछे जाने पर भी असत्य नहीं बोलना चाहिये
बार बार चाबुक की मार खाने वाले गलिताश्व (अड़ियल टट्टू) की तरह कर्तव्यपालन के लिए बार-बार गुरुओं के निर्देश की अपेक्षा मत रखो
साधना में संशय वही करता है, जो मार्ग में घर करना (ठहरना) चाहता है
विषयभोग क्षणमात्र सुख देते हैं, किंतु बहुकाल पर्यन्त दुःख देते हैं