अणुसासिओ न कुप्पिज्जा
अनुशासन से क्रुद्ध नहीं होना चाहिये
अनुशासन से क्रुद्ध नहीं होना चाहिये
अपने पर नियन्त्रण रखनेवाला ही इस लोक तथा परलोक में सुखी होता है
विचित्र (लच्छेदार) भाषाएँ भी (दुराचारी की दुर्गति से) रक्षा नहीं कर सकतीं, फिर विद्यानुशासन (पाण्डित्य) की तो बात ही क्या?
हे राजन्! बुढ़ापा मनुष्य के सौन्दर्य को नष्ट कर देता है
बुद्धि ही धर्म का निर्णय कर सकती है
सदाचार-प्रवृत्त आत्मा मित्र है और दुराचारप्रवृत शत्रु
क्षमापना से प्रसन्नता के भाव उत्पन्न होते हैं
प्रमत्त मनुष्य धन के द्वारा न इस लोक में अपनी रक्षा कर सकता है, न परलोक में ही
समय पर समयोचित कार्य करना चाहिये
तपविशेष तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है, परन्तु कोई जातिविशेष नहीं दिखाई देता