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क्रुद्ध न हों

क्रुद्ध न हों

अणुसासिओ न कुप्पिज्जा

अनुशासन से क्रुद्ध नहीं होना चाहिये

माता-पिता एवं गुरुजन हमसे बड़े होते हैं – अधिक अनुभवी होते हैं| वे हमें सुधारने के लिए – कुमार्ग से हटा कर हमें सुमार्ग पर ले जाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं| इस प्रयत्न के सिलसिले में अनेक बार वे हमारी आलोचना करते हैं- अनेक बार हमारे दोष बताते हैं और उनसे बचने का उपदेश देते हैं| बार-बार एक ही अपराध करने पर वे हमें डॉंट-फटकार भी बताते हैं अर्थात् ताड़ना-तर्जना भी करते हैं| Continue reading “क्रुद्ध न हों” »

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संयम और सुख

संयम और सुख

अप्पं दंतो सुही होई,
अस्सिं लोए परत्थ य

अपने पर नियन्त्रण रखनेवाला ही इस लोक तथा परलोक में सुखी होता है

संयम सुख का स्रोत्र है| अपनी समस्त मनोवृत्तियों पर अंकुश रखना संयम है| मनोवृत्तियॉं चंचल होती हैं – क्षणिक होती हैं| उन पर अंकुश कौन रख सकता है? Continue reading “संयम और सुख” »

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न भाषा न पांडित्य

न भाषा न पांडित्य

न चित्ता तायए भासा
कुओ विज्जाणुसासणं

विचित्र (लच्छेदार) भाषाएँ भी (दुराचारी की दुर्गति से) रक्षा नहीं कर सकतीं, फिर विद्यानुशासन (पाण्डित्य) की तो बात ही क्या?

भाषाज्ञान और विद्यानुशासन में बहुत अन्तर है| एक आदमी एक ही भाषा जानता हो; फिर भी वह विद्यानुशासित अर्थात् पण्डित हो सकता है; परन्तु कोई अन्य आदमी अनेक भाषाओं का ज्ञाता होकर भी मूर्ख हो सकता है| भाषाओं की जानकारी से ज्ञान नहीं बढ़ता| Continue reading “न भाषा न पांडित्य” »

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सौन्दर्य का नाश

सौन्दर्य का नाश

वण्णं जरा हरइ नरस्स रायं

हे राजन्! बुढ़ापा मनुष्य के सौन्दर्य को नष्ट कर देता है

शैशव अवस्था में व्यक्ति कितना सुन्दर दिखाई देता है? न दाढ़ी, न मूँछ, न चिन्ता, न शोक, न क्रूरता, न भय, न कपट, न अहंकार! सीधा और सरल व्यवहार! हँसमुख चेहरा और मांसल देह! क्षणभर में रोना और क्षणभर में हँसना| Continue reading “सौन्दर्य का नाश” »

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बुद्धिवाद

बुद्धिवाद

पा समिक्खए धम्मं

बुद्धि ही धर्म का निर्णय कर सकती है

महावीर ही थे, जिन्होंने ढाई-हजार वर्ष पहले इस सूक्ति के द्वारा बुद्धिप्रामाण्यवादका डिण्डिम घोष किया था| Continue reading “बुद्धिवाद” »

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मित्र-शत्रु कौन ?

मित्र शत्रु कौन ?

अप्पा मित्तममित्तं य, सुप्पट्ठियदुप्पट्ठियो

सदाचार-प्रवृत्त आत्मा मित्र है और दुराचारप्रवृत शत्रु

अपनी आत्मा ही मित्र है – यदि वह सुप्रवृत्त हो अर्थात् सदाचारनिष्ठ हो और अपनी आत्मा ही शत्रु है – यदि वह दुष्प्रवृत्त हो अर्थात् दुराचारनिष्ठ हो| Continue reading “मित्र-शत्रु कौन ?” »

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क्षमापना से लाभ

क्षमापना से लाभ

खमावणयाएणं पल्हायणभावं जणयइ

क्षमापना से प्रसन्नता के भाव उत्पन्न होते हैं

यदि किसीने हमारा अपराध कर दिया हो और हम उसके बदले उसे दण्ड देने में समर्थ हों, फिर भी दण्ड न दे कर उसे छोड़ दें – क्षमा कर दें तो इससे दोनों को प्रसन्नता होगी – अपराधी को भी और अपराध्य को भी| Continue reading “क्षमापना से लाभ” »

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धन से प्रमत्त का त्राण नहीं

धन से प्रमत्त का त्राण नहीं

वित्तेण ताणं न लभे पमत्ते,
इमम्मि लोए अदु वा परत्था

प्रमत्त मनुष्य धन के द्वारा न इस लोक में अपनी रक्षा कर सकता है, न परलोक में ही

वीरता से या साहस से हमारी रक्षा होती है, कायरता से नहीं| Continue reading “धन से प्रमत्त का त्राण नहीं” »

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समय पर काम करें

समय पर काम करें

काले कालं समायरे

समय पर समयोचित कार्य करना चाहिये

हम भूख लगने पर पानी नहीं पीते और प्यास लगने पर भोजन नहीं करते; क्यों कि ऐसा करना अनुचित है| इसी प्रकार खेलने के समय खाना, खाने के समय पढ़ना या पढ़ने के समय खेलना भी अनुचित है| Continue reading “समय पर काम करें” »

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तपस्या और जाति

तपस्या और जाति

सुक्खं खु दीसइ तवोविसेसो,
न दीसई जाइविसेस कोई

तपविशेष तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है, परन्तु कोई जातिविशेष नहीं दिखाई देता

तपस्या से शरीर में जो कृशता पैदा हो जाती है, उसे देखने से पता चल जाता है कि अमुक व्यक्ति तपस्वी है या नहीं| तपस्या से तपस्वी का तन भले ही क्षीण हो; परन्तु मन क्षीण नहीं होता| Continue reading “तपस्या और जाति” »

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