सद्गृहस्थ धर्मानुकूल ही आजीविका करते हैं
धर्मानुकूल आजीविका
उत्तम तप
ब्रह्मचर्य तपों में उत्तम है
शूरम्मन्य
जाव जेयं न पस्सति
व्यक्ति तभी तक अपने को शूरवीर मानता है, जब तक विजेता को नहीं देख लेता
शक्ति में भी कोई लाखों से बड़ा है; तो हजारों से छोटा भी हो सकता है; क्यों कि दुनिया बहुत बड़ी है| प्रत्येक सेर के लिए कहीं-न-कहीं सवासेर अवश्य मौजूद है| ऐसी अवस्था में आसपास के लोगों से अधिक योग्यता पा कर ही अपने को कोई यदि दुनिया में सबसे बड़ा मान बैठता है; तो यह उसकी भूल है| किसी दिन यदि उसे कोई अपने से बड़ा व्यक्ति मिल गया; तो उस दिन उसका सारा घमण्ड चूर-चूर हो जायगा| समझदार व्यक्ति इसीलिए कभी अपनी योग्यताओं का घमण्ड नहीं करते|
जो लोग ऐसा करते हैं, वे अविवेकी हैं| ऐसे लोग जब तक अपने से अधिक शक्तिशाली विजेता को नहीं देख लेते, तब तक अपने आप को शूरवीर मानते रहते हैं|
- सूत्रकृतांग सूत्र 1/3/1/1
मायामृषावाद
मन में कपट रखकर झूठ नहीं बोलना चाहिये
तप से पूजा की कामना न करें
तप के द्वारा पूजा (प्रतिष्ठा) की अभिलाषा नहीं करनी चाहिये
जीव और शरीर
जीव अन्य है, शरीर अन्य
कर्मों का बन्धन
तमेव आगच्छति संपराए
पहले जो जैसा कर्म किया गया है, भविष्य में वह उसी रूप में उपस्थित होता है
अज्ञ अभिमान करते हैं
अज्ञ अभिमान करते हैं
बूढे बैल
चढ़ाई के मार्ग में बूढे बैलों की तरह साधनामार्ग की कठिनाई में अज्ञ लोग खि होते हैं
रसना पर अंकुश
सुव्रती व्यक्ति कम खाये, कम पीये और कम बोले


















