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धर्मानुकूल आजीविका

धर्मानुकूल आजीविका

धम्मेणं चेव वित्तिं कप्पेमाणा विहरंति

सद्गृहस्थ धर्मानुकूल ही आजीविका करते हैं

जीवित रहने के लिए अन्न और जल चाहिये – कुटुम्ब का पोषण करने के लिए धन चाहिये| मुनियों की बात दूसरी है; परन्तु जो गृहस्थ है, उन्हें तो इस संसार में पद पद पर सम्पत्ति की आवश्यकता होती है| कहते हैं – जिस मुनि के पास कौड़ी (एक पैसा भी) हो, वह कौड़ी का और जिस गृहस्थ के पास कौड़ी न हो, वह भी कौड़ी का ! Continue reading “धर्मानुकूल आजीविका” »

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उत्तम तप

उत्तम तप

तवेसु वा उत्तमं बंभचेरं

ब्रह्मचर्य तपों में उत्तम है

परमार्थ के लिए या आत्मकल्याण के लिए जो विविध कष्टों में सहिष्णुता का परिचय दिया जाता है, वही तपस्या है| शास्त्रों में दो प्रकार की तपस्या का वर्णन आता है – बाह्य तप और अभ्यन्तर तप| अनशन, ऊनोदरी, वृत्तिसंक्षेप, रसपरित्याग, कायक्लेश और प्रतिसंलीनता – ये छः बाह्यतप हैं और प्रायश्‍चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान एवं कायोत्सर्ग ये छः अभ्यन्तर तप| साधक दोनों प्रकार के तप करता है| Continue reading “उत्तम तप” »

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शूरम्मन्य

शूरम्मन्य

सूरं मण्णइ अप्पाणं,
जाव जेयं न पस्सति

व्यक्ति तभी तक अपने को शूरवीर मानता है, जब तक विजेता को नहीं देख लेता

दुनिया में एक से बढ़कर एक लोग चारों ओर भरे पड़े हैं| कोई रूप में बड़ा है, कोई विद्या में – कोई धन में बड़ा है तो कोई शक्ति में|

शक्ति में भी कोई लाखों से बड़ा है; तो हजारों से छोटा भी हो सकता है; क्यों कि दुनिया बहुत बड़ी है| प्रत्येक सेर के लिए कहीं-न-कहीं सवासेर अवश्य मौजूद है| ऐसी अवस्था में आसपास के लोगों से अधिक योग्यता पा कर ही अपने को कोई यदि दुनिया में सबसे बड़ा मान बैठता है; तो यह उसकी भूल है| किसी दिन यदि उसे कोई अपने से बड़ा व्यक्ति मिल गया; तो उस दिन उसका सारा घमण्ड चूर-चूर हो जायगा| समझदार व्यक्ति इसीलिए कभी अपनी योग्यताओं का घमण्ड नहीं करते|

जो लोग ऐसा करते हैं, वे अविवेकी हैं| ऐसे लोग जब तक अपने से अधिक शक्तिशाली विजेता को नहीं देख लेते, तब तक अपने आप को शूरवीर मानते रहते हैं|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/3/1/1

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मायामृषावाद

मायामृषावाद

सादियं न मुसं बूया

मन में कपट रखकर झूठ नहीं बोलना चाहिये

झूठ बोलना बुरा है; परन्तु उसकी बुराई की मात्रा का निर्णय तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक यह पता नहीं लग जाता कि झूठ बोलने का कारण और प्रयोजन क्या है| Continue reading “मायामृषावाद” »

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तप से पूजा की कामना न करें

तप से पूजा की कामना न करें

नो पूयणं तवसा आवहेज्जा

तप के द्वारा पूजा (प्रतिष्ठा) की अभिलाषा नहीं करनी चाहिये

कल्पना कीजिये – एक नौका में बैठकर कुछ यात्री नदी पार कर रहे हैं| वे देखते हैं कि नौका में पानी भरने लगा है और इससे धीरे-धीरे नौका डूबने की सम्भावना पैदा हो गई है| वे तत्काल नौका के छिद्रों को ढूँढते हैं, जहॉं से पानी भीतर प्रवेश कर रहा है| Continue reading “तप से पूजा की कामना न करें” »

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जीव और शरीर

जीव और शरीर

ओ जीवो अं सरीरं

जीव अन्य है, शरीर अन्य

‘‘मैं’’ शब्द से आत्मा या जीव का प्रत्यभिज्ञान होता है; इसलिए कुछ लोग ‘‘मै अन्धा हूँ’’ आदि प्रयोग देखकर इन्द्रियों को ही आत्मा मान बैठते हैं| कुछ लोग ‘‘मैं दोड़ता हूँ’’, ‘‘मैं बीमार हूँ’’, ‘‘मैं कपड़े धोता हूँ’’, ‘‘मैं स्नान करता हूँ’’, आदि प्रयोगों के आधार पर शरीर को ही आत्मा मान लेते हैं| Continue reading “जीव और शरीर” »

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कर्मों का बन्धन

कर्मों का बन्धन

जं जारिसं पुव्वमकासि कम्मं,
तमेव आगच्छति संपराए

पहले जो जैसा कर्म किया गया है, भविष्य में वह उसी रूप में उपस्थित होता है

लकड़ी के गेंद को यदि पानी में डाल दिया जाये तो वह डूबेगी नहीं, तैरेगी| आत्मा उससे अधिक हल्की है – बहुत हल्की; फिर भी वह संसार में डूबी हुई है| ऐसा क्यों ? Continue reading “कर्मों का बन्धन” »

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अज्ञ अभिमान करते हैं

अज्ञ अभिमान करते हैं

बालजणो पगभई

अज्ञ अभिमान करते हैं

विद्या से विनय पैदा होना चाहिये| बिना विनय के विद्या में वृद्धि नहीं होगी और प्राप्त विद्या भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगेगी| विनय से ही विद्या की शोभा होती है| अतः अपनी विद्वत्ता की शोभा के लिए भी इस विनय नामक गुण को अपनाने की आवश्यकता है| Continue reading “अज्ञ अभिमान करते हैं” »

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बूढे बैल

बूढे बैल

तत्थ मंदा विसीयंति, उज्जाणंसि जरग्गवा

चढ़ाई के मार्ग में बूढे बैलों की तरह साधनामार्ग की कठिनाई में अज्ञ लोग खि होते हैं

साधना के मार्ग में बहुत धीरज से चलते रहने की आवश्यकता होती है| उसमें संकट आते हैं – कठिनाइयॉं आती हैं – बाधाएँ आती हैं| बुद्धिमान साधक यह सोचते हैं कि यह सारा उपद्रव हमारे धैर्य की परीक्षा के लिए हो रहा है| Continue reading “बूढे बैल” »

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रसना पर अंकुश

रसना पर अंकुश

अप्पपिण्डासि पाणासि अप्पं भासेज्ज सुव्वए

सुव्रती व्यक्ति कम खाये, कम पीये और कम बोले

जीभ के दो काम हैं – स्वाद लेना और बोलना| दोनों में संयम की बड़ी आवश्यकता है| Continue reading “रसना पर अंकुश” »

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