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भक्तामर स्तोत्र – श्लोक 5

सोहं तथापि तव भक्तिवशान्मुनीश !
कर्तुं स्तवं विगतशक्तिरपि प्रवृत्तः |
प्रीत्यात्मवीर्यमविचार्य मृगो मृगेन्द्रं
नाभ्येति किं निजशिशोः परिपालनार्थम् ? ||5||

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मोक्ष और निर्वाण

मोक्ष और निर्वाण

अगुणिस्स नत्थि मोक्खो,
नत्थि अमोक्खस्स निव्वाणं

गुणोंके अभाव में मोक्ष नहीं होता और मोक्षके अभाव में निर्वाण नहीं होता

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बहुत न बोलें

बहुत न बोलें

बहुयं मा य आलवे

बहुत अधिक न बोले

कुछ लोग बहुत अधिक बोला करते हैं| वे दिन भर कुछ न कुछ बोलते ही रहते हैं| मौन रहना उन्हें नहीं सुहाता| बड़ी बुरी आदत है यह| Continue reading “बहुत न बोलें” »

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विषलिप्त कॉंटा

विषलिप्त कॉंटा

तम्हा उ वज्जए इत्थी,
विसलित्तं व कंटगं नच्चा

विषलिप्त कॉंटे की तरह जानकर ब्रह्मचारी स्त्री का त्याग करे

स्त्रियों के प्रति – ऐसा लगता है कि प्रकृति ने कुछ पक्षपात किया है| पुरुषों की अपेक्षा उनका स्वर स्वाभाविक रूप से अधिक मधुर होता है| कोयल का पंचम स्वर उनके कण्ठ में बिठा दिया गया है| Continue reading “विषलिप्त कॉंटा” »

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वृद्धावस्था

वृद्धावस्था

से ण हासाए, ण किड्डाए,
ण रतीए, ण विभूसाए

वृद्ध होने पर व्यक्ति न हास-परिहास के योग्य रहता है, न क्रीड़ा के, न रति के और न शृंगार के ही

जन्म लेने के बाद प्रत्येक व्यक्ति शिशु, बालक, किशोर और तरुण बनकर क्रमशः वृद्धावस्था को प्राप्त करता है| यदि कोई किशोर चाहे के मैं तरुण न बनूँ; तो यह उसके वश की बात नहीं है| किशोरावस्था के बाद तारुण्य अनिवार्य है| Continue reading “वृद्धावस्था” »

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जीव विचार – गाथा 6

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भोगों का त्याग

भोगों का त्याग

उविच्च भोगा पुरिसं चयन्ति,
दुमं जहा खीणफलं व पक्खी

जैसे क्षीणफल वृक्ष को पक्षी छोड़ देते हैं, वैसे भोग क्षीणपुण्य पुरुष को छोड देते हैं

जब तक वृक्ष पर मधुर पके हुए फल होते हैं, तब तक दूर-दूर से पक्षी उसकी शाखाओं पर आ कर बैठते हैं और फलों का मन-चाहा उपभोग करते हैं; परन्तु जब सारे फल समाप्त हो जाते हैं और ऋतु बदल जाने से नये फल उत्प होने की सम्भावना नहीं रहती, तब सारे पक्षी उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं| Continue reading “भोगों का त्याग” »

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अनन्त इच्छा

अनन्त इच्छा

इच्छा हु आगाससमा अणंतया

इच्छा आकाश के समान अनन्त होती है

हम दुःखी क्यों हैं|

इसलिए कि हम कुछ चाहते हैं|

इसका अर्थ?

अर्थ यही कि इच्छा स्वयं दुःख है! Continue reading “अनन्त इच्छा” »

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मोह और दुःख

मोह और दुःख

लुप्पंति बहुसो मूढा, संसारम्मि अणंतए

अनन्त संसार में मूढ बहुशः लुप्त (नष्ट) होते हैं

‘मूढ़’ का अर्थ है – मोहग्रस्त| जिनके मन में मोह भरा होता है, वे व्यक्ति इस अनन्त संसार में अनेक प्रकार से दुखी होते है| Continue reading “मोह और दुःख” »

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मैत्री करो

मैत्री करो

मेत्तिं भूएसु कप्पए

प्राणियों से मैत्री करो

क्रोध, मान, माया और लोभ – ये चार कषाय आत्मा को उद्विग्न करते हैं – अशान्त बनाते हैं; इतना ही नहीं, बल्कि जिनके प्रति उनका प्रयोग किया जाता है, उन्हें भी उद्विग्न एवं अशान्त बना देते हैं| अपने कषाय के प्रदर्शन से उद्विग्न बने हुए दूसरे लोग हमारे वैरी बन जाते हैं और हम से वैर करते हैं – बदले में हम भी उनसे वैर करते है और इस प्रकार वैर प्रबल से प्रबलतर होता जाता है| Continue reading “मैत्री करो” »

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