जे कंखाए य अन्तए
जिसने कांक्षा (आसक्ति) का अन्त कर दिया है, वह मनुष्यों का चक्षु है
जिसने कांक्षा (आसक्ति) का अन्त कर दिया है, वह मनुष्यों का चक्षु है
किसी भी अन्य जीव को त्रास मत दो
बुद्धिमान ज्ञान पा कर नम्र हो जाता है
आत्मा अकेला ही अपना दुःख भोगता है
दुःख अपनी भूल का एक अनिवार्य परिणाम है, जिसे प्रत्येक प्राणी भोगता है| अपना दुःख दूसरा कोई बँटा नहीं सकता| चाहे कोई कितना भी घनिष्ट मित्र हो, रिश्तेदार हो, कुटुम्बी हो- अपने दुःख में वे लोग सहानुभूति प्रकट कर सकते हैं – सेवा कर सकते हैं – सहायता कर सकते हैं, परन्तु हमारा दुःख वे छीन नहीं सकते – भोग नहीं सकते | Continue reading “अपना दुःख” »
जो पराधीन होने से भोग नहीं कर पाते, उन्हें त्यागी नहीं कहा जा सकता
कामभोग अन्य हैं, मैं अन्य हूँ
मैं अकेला हूँ – मेरा कोई नहीं है और मैं भी किसी का नहीं हूँ
प्राणवध चण्ड है, रौद्र है, क्षुद्र है, अनार्य है, करुणारहित है, क्रूर है, भयंकर है
मूर्च्छा को ही परिग्रह कहा गया है
जो दूसरे मनुष्य का परिभव (तिरस्कार) करता है, वह संसार में भटकता रहता है