1 0 Tag Archives: जैन सूत्र
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अवक्तव्य

अवक्तव्य

जं छं तं न वत्तव्वं

जो गोपनीय हो उसे न कहें

जो गोपनीय बात हो, उसे गुप्त ही रखनी चाहिये| समय या योग्य अवसर आने पर ही उसका प्रकाशन उपयुक्त होता है| Continue reading “अवक्तव्य” »

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दूर से ही त्याग

दूर से ही त्याग

कुसीलवड्ढणं ठाणं, दूरओ परिवज्जए

कुशील (दुराचार) बढ़ानेवाले कारणों का दूर से ही त्याग करना चाहिये

शील का अर्थ है – स्वभाव| जिसका स्वभाव अच्छा होता है – प्रशंसनीय होता है, वह सुशील कहलाता है| जो व्यक्ति चाहता है कि सब लोग उससे प्यार करें – उसकी प्रशंसा करें, वह सदा सुशील बनने का और बने रहने का प्रयास करेगा| Continue reading “दूर से ही त्याग” »

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न प्रिय, न अप्रिय

न प्रिय, न अप्रिय

सव्वं जगं तु समयाणुपेही,
पियमप्पियं कस्स वि नो करेज्जा

सारे जगत को जो समभाव से देखता है उसे न किसी का प्रिय करना चाहिये, न अप्रिय

भावना हमारे समस्त कार्यकलाप की प्रेरिका है| यदि उसमें शुद्ध रहे; तो हमसे शुद्ध कार्य होंगे और यदि उसमें अशुद्धि रहे; तो अशुद्ध कार्य होंगे| Continue reading “न प्रिय, न अप्रिय” »

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महर्षि और संयत

महर्षि और संयत

अणुए नावणए महेसी,
न यावि पूयं, गरिहं च संजए

जो पूजा पा कर भी अहंकार नहीं करता और निन्दा पाकर भी अपने को हीन नहीं मानता; वह संयत महर्षि है

महर्षि कौन? जिसमें न अहंकार हो न दीनता| संयत कौन? निन्दा और प्रशंसा में जो समभावी हो| Continue reading “महर्षि और संयत” »

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शंकाशील न बनें

शंकाशील न बनें

वितिगिच्छासमावेणं अप्पाणेणं
नो लहइ समाहिं

शंकाशील व्यक्ति को कभी समाधि नहीं मिलती

साधक अपनी साधना प्रारम्भ करने से पहले सद्गुरु के प्रवचन सुनता है| उससे शास्त्रों के प्रति रुचि जागृत होती है| फिर स्वयं शास्त्रों का अध्ययन करके अपने लिए एक मार्ग चुनता है – जीवन की उत्कृष्ट पद्धति को समझता है – उस पर ऊहापोह करके, चिन्तन मनन करके अपना विश्‍वास स्थिर करता है और फिर उठकर चल पड़ता है – चलता रहता है, जब तक उसे सिद्धि प्राप्त नहीं हो जाती| Continue reading “शंकाशील न बनें” »

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पीठ का मांस न खायें

पीठ का मांस न खायें

पिट्ठिमंसं न खाएज्जा

पीठ का मांस नहीं खाना चाहिये अर्थात् किसी की निन्दा उसकी अनुपस्थिति में नहीं करनी चाहिये

किसीकी पीठ पीछे बुराई करना अपनी कायरता का प्रतीक है| यदि किसी की बुराई को नष्ट करना हमारा उद्देश्य है तो हमें उसकी बुराई उसके सामने ही प्रकट करनी चाहिये, जिससे कि विचार करके वह उसे छोड़ सके| Continue reading “पीठ का मांस न खायें” »

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हिंसा के कारण

हिंसा के कारण

कुद्धा हणंति, लुद्धा हणंति, मुद्धा हणंति

क्रुद्धा लुब्ध और मुग्ध हिंसा करते हैं

प्रमादवश प्राणियों के प्राणों को चोट पहुँचाना हिंसा है| हिंसा से सदा दूसरों को दुःख होता है| मनुष्य क्यों दूसरों को दुःख देता है? क्यों हिंसा करता है? इस पर विचार करके ज्ञानियों ने तीन कारण बतलाये हैं| Continue reading “हिंसा के कारण” »

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साधु-सम्पर्क

साधु सम्पर्क

कुज्जा साहूहिं संथवं

साधुओं से सम्पर्क रखना चाहिये

संस्तव का अर्थ है – परिचय, सम्पर्क या संगति|

संगति पूरे जीवन को प्रभावित करती है| वह उन्नति के द्वार खोल देती है| एक कीट – कितना साधारण जीवन होता है उसका? परन्तु फूलों के साथ रहकर भगवान की मूर्ति के सिरपर जा पहुँचता है वह| एक छोटी नदी या नाला गंगा के साथ मिलकर कहॉं जा पहुँचता है? रत्नाकर समुद्र में| Continue reading “साधु-सम्पर्क” »

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आतुरता

आतुरता

आतुरा परितावेंति

आतुर परिताप देते हैं

जो व्यक्ति आतुर होते हैं अर्थात् कामातुर या विषयातुर होते हैं, वे दूसरों को परिताप (कष्ट) देते हैं – सताते हैं स्वार्थ में अन्धे बने हुए ऐसे व्यक्तियों के विवेक – चक्षु बन्द रहते हैं| उन्हें कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का भान ही नहीं रहता| अपने कण-भर सुख के लिए वे दूसरों को मणभर दुःख पहुँचाने में भी कोई संकोच नहीं करते| अपने क्षणिक सुख के लिए दूसरों को चिरस्थायी दुःख देनेवाले इन व्यक्तियों की क्रूरता अपनी चरम सीमा पर जा पहुँचती है| Continue reading “आतुरता” »

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स्वपर-कल्याण में समर्थ

स्वपर कल्याण में समर्थ

अलमप्पणो होंति अलं परेसिं

ज्ञानी स्व-परकल्याण करने में समर्थ होते हैं

पत्थर की नाव स्वयं भी डूबती है और बैठनेवाले यात्रियों को भी डुबो देती है; किंतु जो नाव काष्ट की बनी होती है, वह स्वयं भी तैरती है और दूसरों को भी तिराती है| ज्ञानियों और अज्ञानियों में यही अन्तर है| अज्ञानी स्वयं तो संसार में भटकते ही हैं, साथ ही अपने आश्रितों को भी कुमार्ग बता कर भटकाते रहते हैं, किन्तु ज्ञानी न स्वयं भटकते हैं और न दूसरों को ही भटकाते हैं| Continue reading “स्वपर-कल्याण में समर्थ” »

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