हाथी और कुन्थु में समान ही जीव होता है
हाथी और कुन्थु में जीवन
आज भी प्रायश्चित्त विधि है

यदि कोई आत्मा कहती है कि आज इस काल में प्रायश्चित्त नहीं है, प्रायश्चित्त देने वाले नहीं है, इस प्रकार बोलने वाली आत्मा दीर्घसंसारी बनती है, क्योंकि नौवें पूर्व की तृतीय वस्तु में से उद्धृत आचार कल्प, व्यवहार सूत्र आदि प्रायश्चित्त के ग्रंथ एवं वैसे गंभीर गुरुवर आज भी विद्यमान हैं|
गुरुदेव से शुद्ध आलोचना लेने पर अपनी आत्मा हल्की हो जाती है, जैसे माथे से भार उतारने के पश्चात् भारवाहक स्वमस्तक अत्यंत हल्का महसूस करता है| वंदित्तु सूत्र में कहा है कि -
होई अइरेगलहुओ ओहरिय भरुव्व भारवहो
Don’t judge a book by its cover
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भक्तामर स्तोत्र – श्लोक 1
भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् |
सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुगं युगादा-
वालम्बनं भवजले पततां जनानाम् || 1 ||
गुणनाश के कारण
पडिनिवेसेणं, अकयण्णुयाए, मिच्छत्ताभिनिवेसेणं
मनुष्य में विद्यमान गुण भी चार कारणों से नष्ट हो जाते हैं – क्रोध, ईर्ष्या, अकृतज्ञता और मिथ्या आग्रह
पर्युषण महापर्व – तीसरा दिन
पर्युषणासमं नान्यत् कर्मणां मर्मभेदकृत्॥
साध्वी यकिनी महत्तरा
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डरना नहीं चाहिये
डरना नहीं चाहिये| भीत के निकट भय शीघ्र आते हैं
संयम और तप
संयम और तप से आत्मा को भावित (पवित्र) करता हुआ साधक विहार करता है















