जब तक शरीरभंग (मृत्यु) न हो तब तक गुणाकांक्षा रहनी चाहिये
विषयों की तो सभी प्राणी कामना करते रहते हैं; किंतु विवेकी व्यक्ति गुणों की कामना करते हैं| Continue reading “गुणाकांक्षा” »
जब तक शरीरभंग (मृत्यु) न हो तब तक गुणाकांक्षा रहनी चाहिये
विषयों की तो सभी प्राणी कामना करते रहते हैं; किंतु विवेकी व्यक्ति गुणों की कामना करते हैं| Continue reading “गुणाकांक्षा” »
रक्त-सना वस्त्र रक्त से ही धोया जाये तो वह शुद्ध नहीं होता
आत्मसाधक ममत्व के बन्धन को तोड़ फेंके; जैसे महानाग कञ्चुक को उतार देता है

मदनसेना ! ऋतुस्त्राव-रजोदर्शन को मासिक-धर्म कहते हैं| स्वास्थ्य के लिये इस का मास के अंत में होना आवश्यक है| यदि मासिक-धर्म ठीक समय और बिना कष्ट के उचित मात्रा में न हो तो शीघ्र ही उसकी चिकित्सा करना चाहिये| इसमें संकोच और विलंब करना बड़ा घातक है| Continue reading “ऋतु (मासिक) धर्म का पालन” »
उत्तम मां-बाप पुण्य से मिले हैं|
मानव का देह पुण्य से मिला है| Continue reading “यह पुण्य से मिला है” »

इसे न तो तुम्हारी तेज आँखे देख सकती हैं न हाथ ही उसे अपने आधीन रख सकते हैं| मन का न कोई रुप है, न रंग, न आकार| वह विचित्र है, सब देखता है, सब सुनता है| हम जिस शक्ति द्वारा सुख-दु:ख का अनुभव करते हैं उसी अदृश्य शक्ति का नाम है मन| Continue reading “मन क्या है?” »

1. मृदु स्वभाव, सदा हँस कर बोलो|
2. माता-पिता, भाई-बहन, सास-ससुर, ननद-जेठानी आदि परिवार से प्रेम रखो|
3. परिश्रमी स्वभाव, कभी बेकार न रहना|
4. बड़ों की सेवा, उनका आदर, छोटों के प्रति स्नेह रखना| Continue reading “इन शब्दों को न भूलो” »