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रसना पर अंकुश

रसना पर अंकुश

अप्पपिण्डासि पाणासि अप्पं भासेज्ज सुव्वए

सुव्रती व्यक्ति कम खाये, कम पीये और कम बोले

जीभ के दो काम हैं – स्वाद लेना और बोलना| दोनों में संयम की बड़ी आवश्यकता है| Continue reading “रसना पर अंकुश” »

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असंवृत्तों का मोह

असंवृत्तों का मोह

मोहं जंति नरा असंवुडा

असंवृत मनुष्य मोहित हो जाते हैं

जो असंयमी हैं – इन्द्रियों को जो अपने वश में नहीं रख सकते – मन पर जिनका बिल्कुल अधिकार नहीं है; ऐसे लोग विषयों के प्रति शीघ्र आकर्षित हो जाते हैं| Continue reading “असंवृत्तों का मोह” »

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समझ लीजिये

समझ लीजिये

संबुज्झह, किं न बुज्झह?
संबोही खलु पेच्च दुल्लहा

समझो! क्यों नहीं समझते मरने पर संबोध निश्‍चित रूप से दुर्लभ है

अपने अपने शुभाशुभ कर्मों का भोग करते हुए प्राणी इस संसार में चौरासी लाख योनियों में जन्म लेते और मरते रहते हैं| मनुष्य मर कर मनुष्य के रूप में ही जन्म लेता है – ऐसा निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता| Continue reading “समझ लीजिये” »

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अभयदान

अभयदान

दाणाण सेट्ठं अभयप्पयाणं

अभयदान श्रेष्ठ दान है

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निर्मल, मुक्त एवं सहिष्णु

निर्मल, मुक्त एवं सहिष्णु

सारदसलिलं इव सुद्धहियया,
विहग इव विप्पमुक्का,
वसुंधरा इव सव्वफासविसहा

मुनियों का हृदय शरद्कालीन नदी के जल की तरह निर्मल होता है| वे पक्षी की तरह बन्धनों से विप्रमुक्त और पृथ्वी की तरह समस्त सुख-दुःखों को समभाव से सहन करने वाले होते हैं

बरसातके दिनों में नदी का जो पानी चाय या कॉफी की तरह मिट्टी के मिश्रण से लाल या काला दिखाई देता है, वही शरद्काल में निर्मल हो जाता है| मुनिजनों का हृदय भी वैसा ही निर्मल होता है| उसमें विषय कषाय की मलिनता का अभाव होता है| Continue reading “निर्मल, मुक्त एवं सहिष्णु” »

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क्रोध न करें

क्रोध न करें

वुच्चमाणो न संजले

साधक को कोई यदि दुर्वचन कहे; तो भी वह उस पर क्रोध न करे

मनुष्य से जाने-अनजाने भूलें होती ही रहती हैं| अपनी भूलें स्वयं अपने को मालूम नहीं होतीं; इसीलिए “गुरुदेव” की जीवन में आवश्यकता होती है| वे दयावश हमें सुधारने के लिए हमारी भूलें बताते हैं| यदि हम उनके निर्देश के अनुसार विनयपूर्वक एक-एक भूल को सुधारते रहें; तो क्रमशः हमारा जीवन शुद्ध से शुद्धतर होता चला जाये| Continue reading “क्रोध न करें” »

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अमनोज्ञ शब्द न बोलें

अमनोज्ञ शब्द न बोलें

तुमं तुमं ति अमणुं, सव्वसो तं न वत्तए

तू, तुम जैसे अमनोहर शब्द कभी नहीं बोलें

मॉं को और ईश्‍वर को ‘तू’ कहा जाता है, शेष सबको ‘आप’ कहना चाहिये| ‘आप’ शब्द सन्मान दर्शक है| दूसरों से बातचीत करते समय अथवा पत्र व्यवहार में इसी शब्द का प्रयोग करना चाहिये| यदि हम दूसरों के लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करेंगे; तो दूसरे भी हमारे लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करके हमें सन्मान देंगे| Continue reading “अमनोज्ञ शब्द न बोलें” »

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कीचड़ में न फँसें

कीचड़ में न फँसें

महयं पलिगोव जाणिया, जा वि य वंदणपूयणा इहं

संसार में जो वन्दन पूजन (सन्मान) है, साधक उसे महान दलदल समझे

प्रशंसा पाने का भी एक नशा होता है| नशे में जैसे आदमी औचित्य का विचार किये बिना मनमाना काम करता रहता है; वैसे ही प्रशंसा का भूखा व्यक्ति भी औचित्य की मर्यादा भूलकर जिस कार्य से अधिक प्रशंसा मिले, वही कार्य करने लगता है| Continue reading “कीचड़ में न फँसें” »

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वैरवृद्धि

वैरवृद्धि

परिग्गहनिविट्ठाणं वेरं तेसिं पवड्ढइ

जो परिग्रह में व्यस्त हैं, वे संसार में अपने प्रति वैर ही बढ़ाते हैं

जो अपने पास आवश्यकता से अधिक धन का संग्रह करते हैं, वे अपने चारों ओर शत्रुओं की सृष्टि करते हैं| धन संग्रह के लिए नहीं, किन्तु अपनी और दूसरों की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए होता है| यह बात परिग्रही भूल जाते हैं| Continue reading “वैरवृद्धि” »

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आन्तरिक शुद्धि

आन्तरिक शुद्धि

उदगस्स फासेण सिया य सिद्धी,
सिज्झंसु पाणा बहवे दगंसि

यदि जलस्पर्श (स्नान) से ही सिद्धि प्राप्त होती तो बहुत-से जलजीव सिद्ध हो जाते

बहुत-से लोग स्नान करके समझते हैं कि उन्होंने बहुत बड़ी आत्मसाधना कर ली है, परन्तु ऐसे लोग अन्धविश्‍वास के शिकार हैं| वे नहीं समझते कि शारीरिक शुद्धि और आत्मिकशुद्धि में बहुत बड़ा अन्तर है| Continue reading “आन्तरिक शुद्धि” »

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