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वैरवृद्धि

वैरवृद्धि

परिग्गहनिविट्ठाणं वेरं तेसिं पवड्ढइ

जो परिग्रह में व्यस्त हैं, वे संसार में अपने प्रति वैर ही बढ़ाते हैं

जो अपने पास आवश्यकता से अधिक धन का संग्रह करते हैं, वे अपने चारों ओर शत्रुओं की सृष्टि करते हैं| धन संग्रह के लिए नहीं, किन्तु अपनी और दूसरों की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए होता है| यह बात परिग्रही भूल जाते हैं| Continue reading “वैरवृद्धि” »

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आन्तरिक शुद्धि

आन्तरिक शुद्धि

उदगस्स फासेण सिया य सिद्धी,
सिज्झंसु पाणा बहवे दगंसि

यदि जलस्पर्श (स्नान) से ही सिद्धि प्राप्त होती तो बहुत-से जलजीव सिद्ध हो जाते

बहुत-से लोग स्नान करके समझते हैं कि उन्होंने बहुत बड़ी आत्मसाधना कर ली है, परन्तु ऐसे लोग अन्धविश्‍वास के शिकार हैं| वे नहीं समझते कि शारीरिक शुद्धि और आत्मिकशुद्धि में बहुत बड़ा अन्तर है| Continue reading “आन्तरिक शुद्धि” »

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आयु घट रही है|

आयु घट रही है|

सेणे जह वट्टयं हरे, एवं आउखयंमि तुट्टइ

एक ही झपाटे में जैसे बाज बटेर को मार डालता है, वैसे ही आयु क्षीण होने पर मृत्यु भी जीवन को हर लेती है

सारा संसार मृत्यु का भोजन है| कुछ उसके मुँह में है, तो कुछ गोद में या हथेली में| जिसकी अवस्था शेष है – जिसकी आयु अभी पूर्ण नहीं हुई है, वह जीवित भले ही रहे, लेकिन एक दिन उसकी मृत्यु निश्‍चित है| Continue reading “आयु घट रही है|” »

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आत्महित का अवसर

आत्महित का अवसर

अत्तहियं खु दुहेण लब्भइ

आत्महित का अवसर मुश्किल से मिलता है

इस संसार में पत्थर बहुत हैं, हीरे कम-कुत्ते बहुत हैं, हाथी कम-सियार बहुत हैं, सिंह कम – नीम के पेड़ बहुत हैं, आम के कम – कङ्कर बहुत हैं, मोती कम – दुर्जन बहुत हैं, सज्जन कम| Continue reading “आत्महित का अवसर” »

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चक्षु चाहिये

चक्षु चाहिये

सूरोदये पासति चक्खुणेव

सूर्य के उदय होने पर भी आँख से ही देखा जा सकता है

दर्पण सामने हो; फिर भी अन्धे को उसमें अपनी सूरत दिखाई नहीं देती| सूरत देखने के लिए अपनी आँख चाहिये| Continue reading “चक्षु चाहिये” »

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अन्धी पीसे, कुत्ता खाये

अन्धी पीसे, कुत्ता खाये

ए हरंति तं वित्तं, कम्मी कम्मेहिं किच्चति

यथावसर संचित धन को तो अन्य व्यक्ति उड़ा लेते हैं और परिग्रही को अपने पापकर्मों का दुष्फल स्वयं भोगना पड़ता है

व्यक्ति जब चोरी करता है अथवा किसी के धन का अपहरण करता है, तब उसके अन्तःकरण से एक आवाज़ निकलती है – ‘‘मत कर, ऐसा मत कर| बुरा काम है यह|’’ – परन्तु उस आवाज को अनसुनी करके स्वार्थ और प्रलोभन से प्रेरित हो कर व्यक्ति अपना कार्य कर ही डालता है| Continue reading “अन्धी पीसे, कुत्ता खाये” »

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कामों की कामना

कामों की कामना

कामी कामे न कामए, लद्धे वा वि अलद्ध कण्हुइ

साधक कामी बनकर कामभोगों की कामना न करे| उपलब्ध को भी अनुपलब्ध समझे| प्राप्त भोगों पर भी उपेक्षा करे|

काम-भोगों का त्याग कर के जो प्रवृजित हो जाते हैं – दीक्षित हो जाते हैं, उन्हें फिर से कामुक बनकर कामभोगों की कामना कभी नहीं करनी चाहिये और न उनकी प्राप्ति के लिए कोई प्रयत्न ही करना चाहिये| Continue reading “कामों की कामना” »

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विषलिप्त कॉंटा

विषलिप्त कॉंटा

तम्हा उ वज्जए इत्थी,
विसलित्तं व कंटगं नच्चा

विषलिप्त कॉंटे की तरह जानकर ब्रह्मचारी स्त्री का त्याग करे

स्त्रियों के प्रति – ऐसा लगता है कि प्रकृति ने कुछ पक्षपात किया है| पुरुषों की अपेक्षा उनका स्वर स्वाभाविक रूप से अधिक मधुर होता है| कोयल का पंचम स्वर उनके कण्ठ में बिठा दिया गया है| Continue reading “विषलिप्त कॉंटा” »

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वैर में रस न लें

वैर में रस न लें

वैराइं कुव्वइ वेरो,
तओ वेरेहिं रज्जति

वैरी वैर करता है और तब उसी में रस लेता है

खून का दाग खून से नहीं धुलता| वह पानी से ही धुल सकता है| उसी प्रकार वैर से कभी वैर नष्ट नहीं हो सकता| वह शान्ति से – क्षमा से – सहिष्णुता से – प्रेम के प्रयोग से ही नष्ट हो सकता है|परन्तु कुछ लोग ऐसे हैं, जो वैर को वैर से नष्ट करना चाहते हैं| ऐसे लोग आग को घासलेट से बुझाना चाहते हैं, पानी से नहीं| कैसी मूर्खता है? Continue reading “वैर में रस न लें” »

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बालप्रज्ञ

बालप्रज्ञ

अं जणं खिंसइ बालपे

बालप्रज्ञ (अज्ञ) दूसरे मनुष्यों को चिढ़ाता है

स्वयं रोना आर्त्तध्यान है| दूसरों को रुलाना रौद्रध्यान है| संसार के अधिकांश जीवों का अधिकांश समय रोने और रुलाने में ही नष्ट होता है| Continue reading “बालप्रज्ञ” »

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