अप्पपिण्डासि पाणासि अप्पं भासेज्ज सुव्वए
सुव्रती व्यक्ति कम खाये, कम पीये और कम बोले
सुव्रती व्यक्ति कम खाये, कम पीये और कम बोले
असंवृत मनुष्य मोहित हो जाते हैं
समझो! क्यों नहीं समझते मरने पर संबोध निश्चित रूप से दुर्लभ है
मुनियों का हृदय शरद्कालीन नदी के जल की तरह निर्मल होता है| वे पक्षी की तरह बन्धनों से विप्रमुक्त और पृथ्वी की तरह समस्त सुख-दुःखों को समभाव से सहन करने वाले होते हैं
साधक को कोई यदि दुर्वचन कहे; तो भी वह उस पर क्रोध न करे
तू, तुम जैसे अमनोहर शब्द कभी नहीं बोलें
संसार में जो वन्दन पूजन (सन्मान) है, साधक उसे महान दलदल समझे
जो परिग्रह में व्यस्त हैं, वे संसार में अपने प्रति वैर ही बढ़ाते हैं
यदि जलस्पर्श (स्नान) से ही सिद्धि प्राप्त होती तो बहुत-से जलजीव सिद्ध हो जाते