1 0 Tag Archives: जैन सूत्र
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आत्मवत् देखो

आत्मवत् देखो

आयओ बहिया पास

अपने समान ही बाहर (दूसरों को) देख

ज्ञानियों ने पापों से – सब प्रकार के दुराचरणों से बचने का एक अत्यन्त सरल उपाय सुझाया है, जिसके द्वारा हम पुण्य-पाप का-अहिंसा-हिंसाका-धर्माधर्म का निर्णय भी कर सकते हैं और बुराइयों से बच भी सकते हैं| Continue reading “आत्मवत् देखो” »

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विचार वैभिन्य

विचार वैभिन्य

पुढो छंदा इह मानवा

यहॉं मनुष्य विभिन्न रुचियों वाले हैं

इस संसार में हम देखते हैं कि मनुष्यों का परस्पर स्वभाव भिन्न-भिन्न होता है – उनकी रुचियॉं भिन्न-भिन्न होती हैं – उनके विचार भिन्न-भिन्न होते हैं| यहॉं तक कि एक ही मनुष्य के विचार भी समान नहीं रहते-विभिन्न समयों में विभिन्न होते हैं| Continue reading “विचार वैभिन्य” »

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प्रशंसा से मोह

प्रशंसा से मोह

कसोक्खेहिं सद्देहिं पेमं नाभिनिवेसए

कानों को सुख देने वाले (मधुर) शब्दों में आसक्ति नहीं रखनी चाहिये

यदि हम अच्छे काम करेंगे तो लोग हमारी प्रशंसा करेंगेही| प्रशंसा के शब्द बहुत मीठे लगते हैं – कानों को प्रिय लगते हैं; परन्तु कर्णप्रिय शब्दों में हमारी आसक्ति नहीं होनी चाहिये, अन्यथा सम्भव यही है कि हम धूर्तों से धोखा खा जायें| Continue reading “प्रशंसा से मोह” »

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कर्मरज की सफाई

कर्मरज की सफाई

विहुणाहि रयं पुरे कडं

पूर्व सञ्चित कर्म रूप रज को साफ करो

कुत्ता भी जब किसी स्थान पर बैठता है, तब उस स्थान की सफाई कर देता है| यह प्रवृत्ति बतलाती है कि स्वच्छता प्राणियों को प्रिय है|यदि कुछ दिनों तक कपड़े न धोये जायें; तो वे कितने गन्दे हो जाते हैं ? कितने बुरे लगने लगते हैं ? Continue reading “कर्मरज की सफाई” »

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इसी जीवन में

इसी जीवन में

इहलोगे सुचिण्णा कम्मा
इहलोगे सुहफल विवाग संजुत्ता भवन्ति

इस लोक में किये हुए सत्कर्म इस लोक में सुखप्रद होते हैं

इस लोक में अर्थात् इसी भव में – इसी जीवन में किये हुए अच्छे कार्यों का सुफल इसी लोक में मिल जाता है| Continue reading “इसी जीवन में” »

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स्वाध्याय से लाभ

स्वाध्याय से लाभ

सज्झाएणं नाणावरणिज्जं कम्मं खवेइ

स्वाध्याय से ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है

स्वाध्याय का साधारण अर्थ है – वीतरागप्रणीत शास्त्रों का अध्ययन करना| इससे उन कर्मों का क्षय होता है, जो ज्ञान पर आवरण डाले हुए हैं| ज्यों-ज्यों हम स्वाध्याय करते जायेंगे, त्यों-त्यों ज्ञानीवरणीय कर्म क्षीण होते जायेंगे और धीरे-धीरे हमें पूर्ण ज्ञान या सर्वज्ञत्व प्राप्त हो जायेगा| Continue reading “स्वाध्याय से लाभ” »

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दुःख परकृत नहीं होता

दुःख परकृत नहीं होता

अत्तकडे दुक्खे, नो परकडे

दुःख स्वकृत होता है, परकृत नहीं

सभी प्राणी अपने-अपने कर्मों का फल भोगते हैं| कोई अन्य प्राणी किसी को सुख-दुःख नहीं दे सकता| यह सिद्धान्त हमें अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी बनाता है| Continue reading “दुःख परकृत नहीं होता” »

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कर्मों का बन्धन

कर्मों का बन्धन

जं जारिसं पुव्वमकासि कम्मं,
तमेव आगच्छति संपराए

पहले जो जैसा कर्म किया गया है, भविष्य में वह उसी रूप में उपस्थित होता है

लकड़ी के गेंद को यदि पानी में डाल दिया जाये तो वह डूबेगी नहीं, तैरेगी| आत्मा उससे अधिक हल्की है – बहुत हल्की; फिर भी वह संसार में डूबी हुई है| ऐसा क्यों ? Continue reading “कर्मों का बन्धन” »

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क्षमा का जन्म

क्षमा का जन्म

कोहविजएणं खंतिं जणयइ

क्रोधविजय क्षमा का जनक है

अपराधी चाहता है कि यदि उसे क्षमा कर दिया जाये तो कितना अच्छा रहे| यदि पापी अपने पापों के लिए लज्जित हो रहा हो – अपने किये हुए अपराधों के लिए उसके हृदय में वास्तविक पश्‍चात्ताप हो रहा हो; तो उसे अवश्य क्षमा कर देना चाहिये| Continue reading “क्षमा का जन्म” »

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जीवन और रूप

जीवन और रूप

जीवियं चेव रूवं च, विज्जुसंपाय चंचलं

जीवन और रूप विद्युत् की गति के समान चंचल होते हैं

जीवन क्षणभंगुर है | पता नहीं जो सॉंस छोड़ी जा रही है, वह लौट कर भी आयेगी या नहीं| यह जीवन बिजली की चंचल गति के समान चंचल है| क्षण-भर के लिए अपनी चमक दिखा कर बिजली जिस प्रकार लुप्त हो जाती है; उसी प्रकार जीवन भी कुछ वर्षों तक अपनी झलक दिखाकर समाप्त हो जाता है| इसलिए जब तक जीवन विद्यमान है; अच्छे कार्यों द्वारा उसका सदुपयोग कर लेना चाहिये| Continue reading “जीवन और रूप” »

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