आयओ बहिया पास
अपने समान ही बाहर (दूसरों को) देख
अपने समान ही बाहर (दूसरों को) देख
यहॉं मनुष्य विभिन्न रुचियों वाले हैं
कानों को सुख देने वाले (मधुर) शब्दों में आसक्ति नहीं रखनी चाहिये
पूर्व सञ्चित कर्म रूप रज को साफ करो
इस लोक में किये हुए सत्कर्म इस लोक में सुखप्रद होते हैं
स्वाध्याय से ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है
दुःख स्वकृत होता है, परकृत नहीं
पहले जो जैसा कर्म किया गया है, भविष्य में वह उसी रूप में उपस्थित होता है
क्रोधविजय क्षमा का जनक है
जीवन और रूप विद्युत् की गति के समान चंचल होते हैं