पुरिसा ! तुममेव तुमं मित्तं,
किं बहिया मित्तमिच्छसि
किं बहिया मित्तमिच्छसि
हे पुरुष ! तू स्वयं ही अपना मित्र है| अन्य बाहर के मित्रों की चाह क्यों रखता है ?
हे पुरुष ! तू स्वयं ही अपना मित्र है| अन्य बाहर के मित्रों की चाह क्यों रखता है ?
सांसारिक जीव क्रमशः शुद्ध होते हुए मनुष्यभव पाते हैं
साधक को कमलपत्र की तरह निर्लेप और आकाश की तरह निरवलम्ब रहना चाहिये
जो सुप्त हैं, वे अमुनि है मुनि तो सदा जागते रहते हैं
जिसकी दृष्टि सम्यक् है, वह सदा अमूढ़ होता है
विग्रह बढ़ानेवाली बात नहीं करनी चाहिये
जो अति मात्रा में अ-जल ग्रहण नहीं करता, वही निर्ग्रन्थ है
सत्य ही भगवान है
जो अनन्यदर्शी होता है, वह अनन्याराम होता है और जो अनन्याराम होता है, वह अनन्यदर्शी होता है