नादंसणिस्स नाणं, नाणेण विणा न होंति चरणगुणा
सम्यग्दर्शन के अभाव में ज्ञान प्राप्त नहीं होता और ज्ञान के अभाव में चारित्र-गुण प्राप्त नहीं होते
सम्यग्दर्शन के अभाव में ज्ञान प्राप्त नहीं होता और ज्ञान के अभाव में चारित्र-गुण प्राप्त नहीं होते
सभी काम दुःखप्रद होते हैं
मन में कपट रखकर झूठ नहीं बोलना चाहिये
ऋषि सदा प्रसन्न रहते हैं
एक असंयत आत्मा ही अजित शत्रु है
जिसे हम अपना शत्रु समझते हैं| Continue reading “अपराजेय शत्रु” »
तप के द्वारा पूजा (प्रतिष्ठा) की अभिलाषा नहीं करनी चाहिये
जीव अन्य है, शरीर अन्य
पापकर्म न स्वयं करना चाहिये और न दूसरों से कराना चाहिये
बाल (अज्ञानी या मूर्ख) की संगति नहीं करनी चाहिये
जो विचारपूर्वक बोलता है, वही निर्ग्रन्थ है