महप्पसाया इसिणो हवंति
ऋषि सदा प्रसन्न रहते हैं
ऋषि सदा प्रसन्न रहते हैं
एक असंयत आत्मा ही अजित शत्रु है
जिसे हम अपना शत्रु समझते हैं| Continue reading “अपराजेय शत्रु” »
तप के द्वारा पूजा (प्रतिष्ठा) की अभिलाषा नहीं करनी चाहिये
जीव अन्य है, शरीर अन्य
पापकर्म न स्वयं करना चाहिये और न दूसरों से कराना चाहिये
बाल (अज्ञानी या मूर्ख) की संगति नहीं करनी चाहिये
जो विचारपूर्वक बोलता है, वही निर्ग्रन्थ है
अपने समान ही बाहर (दूसरों को) देख
यहॉं मनुष्य विभिन्न रुचियों वाले हैं
कानों को सुख देने वाले (मधुर) शब्दों में आसक्ति नहीं रखनी चाहिये