1 0 Tag Archives: जैन आगम
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साधुओं की प्रसन्नता

साधुओं की प्रसन्नता

महप्पसाया इसिणो हवंति

ऋषि सदा प्रसन्न रहते हैं

जीवन में परिस्थियॉं कभी अनुकूल रहती हैं और कभी प्रतिकूल | प्रतिकूल परिस्थियों में जो धीरज खो देते हैं अर्थात् जिनका मानसिक सन्तुलन नष्ट हो जाता है, वे प्रसन्न नहीं रह सकते| जो अपने मन को क्षणिक सुख देनेवाली विषय-सामग्री एकत्र करने में लगा देते हैं, वे भी सदा अशान्त रहते हैं| Continue reading “साधुओं की प्रसन्नता” »

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अपराजेय शत्रु

अपराजेय शत्रु

एगप्पा अजिए सत्तू

एक असंयत आत्मा ही अजित शत्रु है

अपना शत्रु कौन है ?

जिसे हम अपना शत्रु समझते हैं| Continue reading “अपराजेय शत्रु” »

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तप से पूजा की कामना न करें

तप से पूजा की कामना न करें

नो पूयणं तवसा आवहेज्जा

तप के द्वारा पूजा (प्रतिष्ठा) की अभिलाषा नहीं करनी चाहिये

कल्पना कीजिये – एक नौका में बैठकर कुछ यात्री नदी पार कर रहे हैं| वे देखते हैं कि नौका में पानी भरने लगा है और इससे धीरे-धीरे नौका डूबने की सम्भावना पैदा हो गई है| वे तत्काल नौका के छिद्रों को ढूँढते हैं, जहॉं से पानी भीतर प्रवेश कर रहा है| Continue reading “तप से पूजा की कामना न करें” »

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जीव और शरीर

जीव और शरीर

ओ जीवो अं सरीरं

जीव अन्य है, शरीर अन्य

‘‘मैं’’ शब्द से आत्मा या जीव का प्रत्यभिज्ञान होता है; इसलिए कुछ लोग ‘‘मै अन्धा हूँ’’ आदि प्रयोग देखकर इन्द्रियों को ही आत्मा मान बैठते हैं| कुछ लोग ‘‘मैं दोड़ता हूँ’’, ‘‘मैं बीमार हूँ’’, ‘‘मैं कपड़े धोता हूँ’’, ‘‘मैं स्नान करता हूँ’’, आदि प्रयोगों के आधार पर शरीर को ही आत्मा मान लेते हैं| Continue reading “जीव और शरीर” »

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पाप न करें, न करायें

पाप न करें, न करायें

पावकम्मं नेव कुज्जा न कारवेज्जा

पापकर्म न स्वयं करना चाहिये और न दूसरों से कराना चाहिये

पुण्य का फल सुख है और पाप का फल दुःख | सुख सब चाहते हैं, फिर भी पुण्य करने में आलसी बनते हैं और दुःख कोई नहीं चाहता, फिर भी सावधानी पूर्वक दुःख के कारणों का अर्थात् पापों का सेवन करते हैं| कैसी विचित्र बात है यह? Continue reading “पाप न करें, न करायें” »

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मूर्ख की संगति न करें

मूर्ख की संगति न करें

अलं बालस्स संगेणं

बाल (अज्ञानी या मूर्ख) की संगति नहीं करनी चाहिये

यह एक अनुभूत तथ्य है कि साथ रहनेवालों पर परस्पर एक-दूसरे का प्रभाव पड़ता है| यदि साथी व्यसनी होगा; तो हम भी व्यसनी बन जायेंगे – यदि वह बुद्धिमान होगा तो हमें भी बुद्धिमान बना देगा – यदि वह विद्वान होगा तो हमें भी विद्वान बनने के लिए प्रेरित करेगा| Continue reading “मूर्ख की संगति न करें” »

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विचारपूर्वक बोलें

विचारपूर्वक बोलें

अणुवीइभासी से निग्गंथे

जो विचारपूर्वक बोलता है, वही निर्ग्रन्थ है

बोली से या बातचीत से ही पता लगता है कि कौन मूर्ख है और कौन विद्वान| दोनों में अन्तर क्या है? Continue reading “विचारपूर्वक बोलें” »

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आत्मवत् देखो

आत्मवत् देखो

आयओ बहिया पास

अपने समान ही बाहर (दूसरों को) देख

ज्ञानियों ने पापों से – सब प्रकार के दुराचरणों से बचने का एक अत्यन्त सरल उपाय सुझाया है, जिसके द्वारा हम पुण्य-पाप का-अहिंसा-हिंसाका-धर्माधर्म का निर्णय भी कर सकते हैं और बुराइयों से बच भी सकते हैं| Continue reading “आत्मवत् देखो” »

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विचार वैभिन्य

विचार वैभिन्य

पुढो छंदा इह मानवा

यहॉं मनुष्य विभिन्न रुचियों वाले हैं

इस संसार में हम देखते हैं कि मनुष्यों का परस्पर स्वभाव भिन्न-भिन्न होता है – उनकी रुचियॉं भिन्न-भिन्न होती हैं – उनके विचार भिन्न-भिन्न होते हैं| यहॉं तक कि एक ही मनुष्य के विचार भी समान नहीं रहते-विभिन्न समयों में विभिन्न होते हैं| Continue reading “विचार वैभिन्य” »

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प्रशंसा से मोह

प्रशंसा से मोह

कसोक्खेहिं सद्देहिं पेमं नाभिनिवेसए

कानों को सुख देने वाले (मधुर) शब्दों में आसक्ति नहीं रखनी चाहिये

यदि हम अच्छे काम करेंगे तो लोग हमारी प्रशंसा करेंगेही| प्रशंसा के शब्द बहुत मीठे लगते हैं – कानों को प्रिय लगते हैं; परन्तु कर्णप्रिय शब्दों में हमारी आसक्ति नहीं होनी चाहिये, अन्यथा सम्भव यही है कि हम धूर्तों से धोखा खा जायें| Continue reading “प्रशंसा से मोह” »

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