1 0 Tag Archives: जैन आगम
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भोगों का त्याग

भोगों का त्याग

उविच्च भोगा पुरिसं चयन्ति,
दुमं जहा खीणफलं व पक्खी

जैसे क्षीणफल वृक्ष को पक्षी छोड़ देते हैं, वैसे भोग क्षीणपुण्य पुरुष को छोड देते हैं

जब तक वृक्ष पर मधुर पके हुए फल होते हैं, तब तक दूर-दूर से पक्षी उसकी शाखाओं पर आ कर बैठते हैं और फलों का मन-चाहा उपभोग करते हैं; परन्तु जब सारे फल समाप्त हो जाते हैं और ऋतु बदल जाने से नये फल उत्प होने की सम्भावना नहीं रहती, तब सारे पक्षी उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं| Continue reading “भोगों का त्याग” »

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अनन्त इच्छा

अनन्त इच्छा

इच्छा हु आगाससमा अणंतया

इच्छा आकाश के समान अनन्त होती है

हम दुःखी क्यों हैं|

इसलिए कि हम कुछ चाहते हैं|

इसका अर्थ?

अर्थ यही कि इच्छा स्वयं दुःख है! Continue reading “अनन्त इच्छा” »

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मोह और दुःख

मोह और दुःख

लुप्पंति बहुसो मूढा, संसारम्मि अणंतए

अनन्त संसार में मूढ बहुशः लुप्त (नष्ट) होते हैं

‘मूढ़’ का अर्थ है – मोहग्रस्त| जिनके मन में मोह भरा होता है, वे व्यक्ति इस अनन्त संसार में अनेक प्रकार से दुखी होते है| Continue reading “मोह और दुःख” »

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मैत्री करो

मैत्री करो

मेत्तिं भूएसु कप्पए

प्राणियों से मैत्री करो

क्रोध, मान, माया और लोभ – ये चार कषाय आत्मा को उद्विग्न करते हैं – अशान्त बनाते हैं; इतना ही नहीं, बल्कि जिनके प्रति उनका प्रयोग किया जाता है, उन्हें भी उद्विग्न एवं अशान्त बना देते हैं| अपने कषाय के प्रदर्शन से उद्विग्न बने हुए दूसरे लोग हमारे वैरी बन जाते हैं और हम से वैर करते हैं – बदले में हम भी उनसे वैर करते है और इस प्रकार वैर प्रबल से प्रबलतर होता जाता है| Continue reading “मैत्री करो” »

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वैर में रस न लें

वैर में रस न लें

वैराइं कुव्वइ वेरो,
तओ वेरेहिं रज्जति

वैरी वैर करता है और तब उसी में रस लेता है

खून का दाग खून से नहीं धुलता| वह पानी से ही धुल सकता है| उसी प्रकार वैर से कभी वैर नष्ट नहीं हो सकता| वह शान्ति से – क्षमा से – सहिष्णुता से – प्रेम के प्रयोग से ही नष्ट हो सकता है|परन्तु कुछ लोग ऐसे हैं, जो वैर को वैर से नष्ट करना चाहते हैं| ऐसे लोग आग को घासलेट से बुझाना चाहते हैं, पानी से नहीं| कैसी मूर्खता है? Continue reading “वैर में रस न लें” »

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अन्यथा मुक्ति नहीं

अन्यथा मुक्ति नहीं

कडाण कम्माण न अत्थि मोक्खो

कृत कर्मों का (फल भोगे बिना) छुटकारा नहीं होता

यदि दीपक की लौ पर कोई अपनी उँगली रखे तो क्या होगा ? उष्णता का अनुभव होगा और वह जलने लगेगी| जलन का अनुभव होगा और वह जलने लगेगी| जलन का अनुभव होने पर यदि उँगली दीपक की लौ से हटा भी ली जाये तो भी उसकी वेदना कुछ दिनों तक होती रहेगी| Continue reading “अन्यथा मुक्ति नहीं” »

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बालप्रज्ञ

बालप्रज्ञ

अं जणं खिंसइ बालपे

बालप्रज्ञ (अज्ञ) दूसरे मनुष्यों को चिढ़ाता है

स्वयं रोना आर्त्तध्यान है| दूसरों को रुलाना रौद्रध्यान है| संसार के अधिकांश जीवों का अधिकांश समय रोने और रुलाने में ही नष्ट होता है| Continue reading “बालप्रज्ञ” »

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दुःख और तृष्णा

दुःख और तृष्णा

दुक्खं हयं जस्स न होइ मोहो,
मोहो हओ जस्स न होइ तण्हा

जिसमें मोह नहीं होता, उसका दुःख नष्ट हो जाता है और जिसमें तृष्णा नहीं होती उसका मोह नष्ट हो जाता है

तृष्णा बड़े-बड़े धैर्यशालियों के भी छक्के छुड़ा देती है – आँख वालों को भी अन्धा बना देती है, अन्धेरी रात में आँखवालों को जिस प्रकार पास में पड़ी हुई वस्तु भी दिखाई नहीं देती, उसी प्रकार तृष्णाग्रस्त व्यक्ति को अपने पास रही हुई सम्पत्ति भी दिखाई नहीं देती और वह अधिक से अधिक सम्पत्ति पाने की कोशिश में लगा रहता है – जीवन भर घानी के बैल की तरह परिश्रम करता रहता है| Continue reading “दुःख और तृष्णा” »

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न तृप्ति, न तृष्टि

न तृप्ति, न तृष्टि

देवावि सइंदगा न तित्तिं न तुट्ठिं उवलभन्ति

इन्द्रों सहित देव भी (विषयों से) न कभी तृप्त होते हैं, न सन्तुष्ट

पॉंच इन्द्रियॉं हैं और उनके अलग-अलग विषय हैं| जीवनभर जीव विषय-सामग्री को जुटाने के लिए दौड़-धूप करता रहता है| एक इन्द्रिय के विषय जुटाने पर दूसरी इन्द्रिय के और दूसरी के बाद तीसरी, चौथी और पॉंचवी इन्द्रिय के विषय क्रमशः जुटाने पड़ते हैं| Continue reading “न तृप्ति, न तृष्टि” »

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कर्म का मूल हिंसा

कर्म का मूल हिंसा

कम्ममूलं च जं छणं

जो क्षण है, वह कर्म का मूल है

‘क्षण’ शब्द ‘क्षणवधे’ इस तनादि गण की उभयपदी सकर्मक धातु से बना है, जिसका अर्थ है – हिंसा| वैसे इस शब्द के और भी अनेक अर्थ हैं – निमेषक्रिया का चतुर्थ भाग, उत्सव, अवसर आदि; परन्तु इस सूक्ति में उस का मूल अर्थ ‘वध’ या ‘हिंसा’ ही ठीक लगता है| Continue reading “कर्म का मूल हिंसा” »

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