अनुशासन से क्रुद्ध नहीं होना चाहिये
क्रुद्ध न हों
प्रेम का नाशक
क्रोध प्रीति का नाशक है
भगवान पार्श्वनाथ – जन्म कल्याणक
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संयम और सुख
अस्सिं लोए परत्थ य
अपने पर नियन्त्रण रखनेवाला ही इस लोक तथा परलोक में सुखी होता है
कायोत्सर्ग
सर्वथा काया को मोह छोड़ता हूँ – मेरी देह पर कोई परीषह जैसे है ही नहीं
अपने धड़कते दिल से पूछो

जिंदगी थोड़ी है, समय उससे भी कम| जैसे जैसे समय बीतता है, वैसे वैसे हम मृत्यु के निकट पहुँचते जाते हैं| आँखे खोल कर श्मशान की तरफ जाते हुए मुरदों की तरफ देखो और सोचो कि एक दिन हमारी भी यही हालत होगी| फिर क्यों न हम अनंत भव भटकने के बाद प्राप्त अति दुर्लभ अनमोल मानव भव को सफल बना ले| Continue reading “अपने धड़कते दिल से पूछो” »
न भाषा न पांडित्य
कुओ विज्जाणुसासणं
विचित्र (लच्छेदार) भाषाएँ भी (दुराचारी की दुर्गति से) रक्षा नहीं कर सकतीं, फिर विद्यानुशासन (पाण्डित्य) की तो बात ही क्या?
















