1 0
post icon

राग द्वेष के कारण

राग द्वेष के कारण

रागस्स हेउं समणुमाहु,
दोसस्स हेउं अमणुमाहु

मनोज्ञ शब्दादि राग के और अमनोज्ञ द्वेष के कारण कहे गये हैं

शब्द, रूप, रस, गन्ध और स्पर्श – ये पॉंचों राग के भी कारण हैं और द्वेष के भी|

कोमल प्रशंसात्मक शब्द हमें अच्छे लगते हैं और कठोर निन्दात्मक शब्द बुरे| Continue reading “राग द्वेष के कारण” »

Leave a Comment
post icon

राग द्वेष का क्षय

राग द्वेष का क्षय

रागस्स दोसस्स य संखएणं
एगंतसोक्खं समुवेइ मोक्खं

राग-द्वेष के क्षय से जीव एकान्तसुखस्वरूप मोक्ष को प्राप्त करता है

राग अपने को रुलाता है और द्वेष दूसरों को | रोना किसे अच्छा लगता है ? किसीको नहीं; तब भला रुलाना क्यों अच्छा लगना चाहिये ? हँसने-हँसाने में अर्थात् स्वयं प्रसन्नचित्त रहने और दूसरों को प्रसन्नता वितरित करने में ही जीवन की सफलता निहित है| Continue reading “राग द्वेष का क्षय” »

Leave a Comment
post icon

The Lord’s Marriage

Sorry, this article is only available in English. Please, check back soon. Alternatively you can subscribe at the bottom of the page to recieve updates whenever we add a hindi version of this article.

Leave a Comment
post icon

सद्गुण साधना

सद्गुण साधना

बाहाहिं सागरो चेव,
तरियव्वो गुणोदहिं

सद्गुण-साधना का कार्य भुजाओं से समुद्र तैरने के समान है

पहले नावों से समुद्र-यात्राएँ की जाती थीं| अब बड़े-बड़े जहाज बन गये हैं, जिनमें बैठकर यात्री एक देश से दूसरे देश में आसानी से चले जाते हैं| जबसे वायुयान बनने लगे हैं, जलयानों का भी महत्त्व घट गया है| अब बीच में पड़नेवाले सुविशाल समुद्रों की भी पर्वाह न करके लोग वायुयानों के द्वारा ही परदेश जा पहुँचते हैं| Continue reading “सद्गुण साधना” »

Leave a Comment
post icon

Wallpaper #5

The soul comes alone and goes alone, no one companies it and no one becomes its mate

Standard Screen Widescreen
1024×768 1440×900
1600×1200 1920×1080

Leave a Comment
post icon

विज्ञान और धर्म

विज्ञान और धर्म

विण्णए समागम्म धम्मसाहणमिच्छिउं

धर्म के साधनों का विज्ञान से समन्वय करना चाहिये

धर्म के साधनों का विज्ञान से समझौता होना चाहिये और विज्ञान के साधनों का धर्म से| इस प्रकार धर्म से विज्ञान का सम्बन्ध जुड़ना चाहिये; दोनों का समन्वय होना चाहिये| दोनों परस्पर एक-दूसरे के पूरक बनें – सहयोगी बनें, विरोधी न रहें| इसकी जिम्मेदारी वैज्ञानिकों पर भी है और धर्मात्माओं पर भी| Continue reading “विज्ञान और धर्म” »

Leave a Comment
post icon

श्रद्धा से टिके रहें

श्रद्धा से टिके रहें

जाए सद्धाए निक्खंते,
तमेव अणुपालेज्जा विजहित्ता विसोत्तियं

जिस श्रद्धा के साथ निष्क्रमण किया है, उसी श्रद्धा के साथ विस्त्रोतसिका (शंका) छोड़कर उसका अनुपालन करना चाहिये

साधना के मार्ग में फूलों से अधिक तीक्ष्ण कण्टक होते हैं, इसलिए साधक को बीच-बीच में अनेक संकटों का सामना करना पड़ता है| उनसे व्याकुल हो कर कभी-कभी वह अपने मार्ग से भटक जाता है – बारम्बार मिलनेवाली असफलताओं से कभी-कभी वह निराश भी हो जाता है| Continue reading “श्रद्धा से टिके रहें” »

Leave a Comment
post icon

Quote #1

‎"Impossible" is not a concrete fact. It's just an opinion.
Paulo Coelho
Leave a Comment
post icon

उत्तम तप

उत्तम तप

तवेसु वा उत्तमं बंभचेरं

ब्रह्मचर्य तपों में उत्तम है

परमार्थ के लिए या आत्मकल्याण के लिए जो विविध कष्टों में सहिष्णुता का परिचय दिया जाता है, वही तपस्या है| शास्त्रों में दो प्रकार की तपस्या का वर्णन आता है – बाह्य तप और अभ्यन्तर तप| अनशन, ऊनोदरी, वृत्तिसंक्षेप, रसपरित्याग, कायक्लेश और प्रतिसंलीनता – ये छः बाह्यतप हैं और प्रायश्‍चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान एवं कायोत्सर्ग ये छः अभ्यन्तर तप| साधक दोनों प्रकार के तप करता है| Continue reading “उत्तम तप” »

Leave a Comment
post icon

चार संयम

चार संयम

चउव्विहे संजमे – मणसंजमे,
वइसंजमे, कायसंजमे, उवगरणसंजमे

मनसंयम, वचनसंयम, शरीरसंयम और उपकरणसंयम – ये संयम के चार प्रकार हैं

समुद्र जिस प्रकार अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, उसी प्रकार साधुसन्त भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ते| संयम का पालन करना ही उनकी मर्यादा है| Continue reading “चार संयम” »

Leave a Comment
Page 58 of 67« First...102030...5657585960...Last »