यहॉं मनुष्य विभिन्न रुचियों वाले हैं
विचार वैभिन्य
भक्तामर स्तोत्र – श्लोक 4
वक्तुं गुणान् गुणसमुद्र ! शशांककान्तान्
कस्ते क्षमः सुरगुरु-प्रतिमोऽपि बुद्धया ?
कल्पान्तकाल – पवनोद्धत – नक्रचक्रं
को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम् ? ||4||
प्रशंसा से मोह
कानों को सुख देने वाले (मधुर) शब्दों में आसक्ति नहीं रखनी चाहिये
कर्मरज की सफाई
पूर्व सञ्चित कर्म रूप रज को साफ करो
Wallpaper #1
मनडुं किमही न बाजे
श्री कुंथुनाथ जिन स्तवन
कुंथुजिन! मनडुं किमही न बाजे,
हो कुंथुजिन! मनडुं किमही न बाजे;
जिम जिम जतन करीने राखुं,
तिम तिम अलगुं भाजे हो
इसी जीवन में
इहलोगे सुहफल विवाग संजुत्ता भवन्ति
इस लोक में किये हुए सत्कर्म इस लोक में सुखप्रद होते हैं
स्वाध्याय से लाभ
स्वाध्याय से ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है
Description of Vaitadhya
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भक्तामर स्तोत्र – श्लोक 3
बुद्धया विनाऽपि विबुधार्चित-पादपीठ!
स्तोतुं समुद्यत-मति-र्विगतत्रपोहम् |
बालं विहाय जल-संस्थितमिन्दुबिम्ब
मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ? ||3||


















