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वेदों का अध्ययन

वेदों का अध्ययन

वेया अहीया न भवन्ति ताणं

अध्ययन किये गये वेद रक्षा नहीं कर सकते

अमुक व्यक्ति वेदों का पारायण करता है – अध्ययन करता है; इसलिए आदरणीय है – पूज्य है – पवित्र है – ऐसा मानना भ्रमपूर्ण है| क्यों? ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि आदरणीयता, पूज्यता एवं पवित्रता का सम्बन्ध सच्चरित्रता से है, त्याग से है, परोपकार से है, सदाचार से है; वेदों के अध्ययन से नहीं| Continue reading “वेदों का अध्ययन” »

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दुष्कर तपस्या

दुष्कर तपस्या

असिधारागमणं चेव, दुक्करं चरिउं तवो

तपश्‍चरण तलवार की धार पर चलने के समान दुष्कर है

तप दो प्रकार का होता है – अभ्यन्तर और बाह्य| बाह्य तप दिखाई देता है; इसलिए यह तप व्यक्ति को शीघ्र विख्यात कर देता है; परन्तु अभ्यन्तर तप से ऐसा नहीं होता| Continue reading “दुष्कर तपस्या” »

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पाप श्रमण

पाप श्रमण

सुच्चा पिच्चा सुहं सुवइ पावसमणे त्ति वुच्चइ

जो खा-पीकर आराम से सोता है, वह पापश्रमण कहलाता है

भोजन शरीरयात्रा के लिए है| शरीर की शक्ति टिकाये रखने के लिए है; परन्तु जीवन की सफलता शक्ति को टिकाये रखने में नहीं, उसका सदुपयोग करने में है| Continue reading “पाप श्रमण” »

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कर्त्ता – भोक्ता

कर्त्ता   भोक्ता

अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण या सुहाण च

आत्मा ही सुख दुःख का कर्त्ता और भोक्ता है

सुख और दुःख अपने ही कार्यों एवं विचारों के फल हैं; दूसरों के नहीं|

हम अच्छे कार्य करते हैं; तो अपने लिए सुख का निर्माण करते हैं और यदि बुरे कार्य करते हैं; तो दुःख का निर्माण करते हैं| इस प्रकार हम स्वयं ही सुख-दुःख के निर्माता हैं, बनाने वाले हैं| Continue reading “कर्त्ता – भोक्ता” »

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क्रुद्ध न हों

क्रुद्ध न हों

अणुसासिओ न कुप्पिज्जा

अनुशासन से क्रुद्ध नहीं होना चाहिये

माता-पिता एवं गुरुजन हमसे बड़े होते हैं – अधिक अनुभवी होते हैं| वे हमें सुधारने के लिए – कुमार्ग से हटा कर हमें सुमार्ग पर ले जाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं| इस प्रयत्न के सिलसिले में अनेक बार वे हमारी आलोचना करते हैं- अनेक बार हमारे दोष बताते हैं और उनसे बचने का उपदेश देते हैं| बार-बार एक ही अपराध करने पर वे हमें डॉंट-फटकार भी बताते हैं अर्थात् ताड़ना-तर्जना भी करते हैं| Continue reading “क्रुद्ध न हों” »

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संयम और सुख

संयम और सुख

अप्पं दंतो सुही होई,
अस्सिं लोए परत्थ य

अपने पर नियन्त्रण रखनेवाला ही इस लोक तथा परलोक में सुखी होता है

संयम सुख का स्रोत्र है| अपनी समस्त मनोवृत्तियों पर अंकुश रखना संयम है| मनोवृत्तियॉं चंचल होती हैं – क्षणिक होती हैं| उन पर अंकुश कौन रख सकता है? Continue reading “संयम और सुख” »

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न भाषा न पांडित्य

न भाषा न पांडित्य

न चित्ता तायए भासा
कुओ विज्जाणुसासणं

विचित्र (लच्छेदार) भाषाएँ भी (दुराचारी की दुर्गति से) रक्षा नहीं कर सकतीं, फिर विद्यानुशासन (पाण्डित्य) की तो बात ही क्या?

भाषाज्ञान और विद्यानुशासन में बहुत अन्तर है| एक आदमी एक ही भाषा जानता हो; फिर भी वह विद्यानुशासित अर्थात् पण्डित हो सकता है; परन्तु कोई अन्य आदमी अनेक भाषाओं का ज्ञाता होकर भी मूर्ख हो सकता है| भाषाओं की जानकारी से ज्ञान नहीं बढ़ता| Continue reading “न भाषा न पांडित्य” »

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सौन्दर्य का नाश

सौन्दर्य का नाश

वण्णं जरा हरइ नरस्स रायं

हे राजन्! बुढ़ापा मनुष्य के सौन्दर्य को नष्ट कर देता है

शैशव अवस्था में व्यक्ति कितना सुन्दर दिखाई देता है? न दाढ़ी, न मूँछ, न चिन्ता, न शोक, न क्रूरता, न भय, न कपट, न अहंकार! सीधा और सरल व्यवहार! हँसमुख चेहरा और मांसल देह! क्षणभर में रोना और क्षणभर में हँसना| Continue reading “सौन्दर्य का नाश” »

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मित्र-शत्रु कौन ?

मित्र शत्रु कौन ?

अप्पा मित्तममित्तं य, सुप्पट्ठियदुप्पट्ठियो

सदाचार-प्रवृत्त आत्मा मित्र है और दुराचारप्रवृत शत्रु

अपनी आत्मा ही मित्र है – यदि वह सुप्रवृत्त हो अर्थात् सदाचारनिष्ठ हो और अपनी आत्मा ही शत्रु है – यदि वह दुष्प्रवृत्त हो अर्थात् दुराचारनिष्ठ हो| Continue reading “मित्र-शत्रु कौन ?” »

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बुद्धिवाद

बुद्धिवाद

पा समिक्खए धम्मं

बुद्धि ही धर्म का निर्णय कर सकती है

महावीर ही थे, जिन्होंने ढाई-हजार वर्ष पहले इस सूक्ति के द्वारा बुद्धिप्रामाण्यवादका डिण्डिम घोष किया था| Continue reading “बुद्धिवाद” »

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