अध्ययन किये गये वेद रक्षा नहीं कर सकते
वेदों का अध्ययन
दुष्कर तपस्या
तपश्चरण तलवार की धार पर चलने के समान दुष्कर है
पाप श्रमण
जो खा-पीकर आराम से सोता है, वह पापश्रमण कहलाता है
कर्त्ता – भोक्ता
आत्मा ही सुख दुःख का कर्त्ता और भोक्ता है
हम अच्छे कार्य करते हैं; तो अपने लिए सुख का निर्माण करते हैं और यदि बुरे कार्य करते हैं; तो दुःख का निर्माण करते हैं| इस प्रकार हम स्वयं ही सुख-दुःख के निर्माता हैं, बनाने वाले हैं| Continue reading “कर्त्ता – भोक्ता” »
क्रुद्ध न हों
अनुशासन से क्रुद्ध नहीं होना चाहिये
संयम और सुख
अस्सिं लोए परत्थ य
अपने पर नियन्त्रण रखनेवाला ही इस लोक तथा परलोक में सुखी होता है
न भाषा न पांडित्य
कुओ विज्जाणुसासणं
विचित्र (लच्छेदार) भाषाएँ भी (दुराचारी की दुर्गति से) रक्षा नहीं कर सकतीं, फिर विद्यानुशासन (पाण्डित्य) की तो बात ही क्या?
सौन्दर्य का नाश
हे राजन्! बुढ़ापा मनुष्य के सौन्दर्य को नष्ट कर देता है
मित्र-शत्रु कौन ?
सदाचार-प्रवृत्त आत्मा मित्र है और दुराचारप्रवृत शत्रु
बुद्धिवाद
बुद्धि ही धर्म का निर्णय कर सकती है


















