पा समिक्खए धम्मं
बुद्धि ही धर्म का निर्णय कर सकती है
बुद्धि ही धर्म का निर्णय कर सकती है
सदाचार-प्रवृत्त आत्मा मित्र है और दुराचारप्रवृत शत्रु
क्षमापना से प्रसन्नता के भाव उत्पन्न होते हैं
प्रमत्त मनुष्य धन के द्वारा न इस लोक में अपनी रक्षा कर सकता है, न परलोक में ही
समय पर समयोचित कार्य करना चाहिये
तपविशेष तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है, परन्तु कोई जातिविशेष नहीं दिखाई देता
इच्छाओं को रोकने से ही मोक्ष प्राप्त होता है
मिट्टी के सूखे गोले के समान विरक्त साधक कहीं भी चिपकता नहीं है
स्वयं सत्यान्वेषण करना चाहिये
जब तक शरीरभंग (मृत्यु) न हो तब तक गुणाकांक्षा रहनी चाहिये
विषयों की तो सभी प्राणी कामना करते रहते हैं; किंतु विवेकी व्यक्ति गुणों की कामना करते हैं| Continue reading “गुणाकांक्षा” »