स्वाध्याय से ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है
स्वाध्याय से लाभ
सज्झाएणं नाणावरणिज्जं कम्मं खवेइ
स्वाध्याय का साधारण अर्थ है – वीतरागप्रणीत शास्त्रों का अध्ययन करना| इससे उन कर्मों का क्षय होता है, जो ज्ञान पर आवरण डाले हुए हैं| ज्यों-ज्यों हम स्वाध्याय करते जायेंगे, त्यों-त्यों ज्ञानीवरणीय कर्म क्षीण होते जायेंगे और धीरे-धीरे हमें पूर्ण ज्ञान या सर्वज्ञत्व प्राप्त हो जायेगा| Continue reading “स्वाध्याय से लाभ” »
भक्तामर स्तोत्र – श्लोक 3
बुद्धया विनाऽपि विबुधार्चित-पादपीठ!
स्तोतुं समुद्यत-मति-र्विगतत्रपोहम् |
बालं विहाय जल-संस्थितमिन्दुबिम्ब
मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ? ||3||
कर्मों का बन्धन
जं जारिसं पुव्वमकासि कम्मं,
तमेव आगच्छति संपराए
तमेव आगच्छति संपराए
पहले जो जैसा कर्म किया गया है, भविष्य में वह उसी रूप में उपस्थित होता है
दुःख परकृत नहीं होता
अत्तकडे दुक्खे, नो परकडे
दुःख स्वकृत होता है, परकृत नहीं
क्षमा का जन्म
कोहविजएणं खंतिं जणयइ
क्रोधविजय क्षमा का जनक है
अज्ञ अभिमान करते हैं
बालजणो पगभई
अज्ञ अभिमान करते हैं
जीवन और रूप
जीवियं चेव रूवं च, विज्जुसंपाय चंचलं
जीवन और रूप विद्युत् की गति के समान चंचल होते हैं
भूल दुहराऊँगा नहीं !
तं परिण्णाय मेहावी, इयाणिं णो,
जमहं पुव्वमकासो पमाएणं
जमहं पुव्वमकासो पमाएणं
मेधावी साधक को आत्मपरिज्ञान के द्वारा यह निश्चय करना चाहिये कि मैंने पूर्वजीवन में प्रमादवश जो कुछ भूल की है, उसे अब कभी नहीं करूँगा
समान भाव रहें
जहा पुण्णस्स कत्थई, तहा तुच्छस्स कत्थई|
जहा तुच्छस्स कत्थई, तहा पुण्णस्स कत्थई|
जहा तुच्छस्स कत्थई, तहा पुण्णस्स कत्थई|
जैसे पुण्यवान को कहा जाता है, वैसे ही तुच्छ को और जैसे तुच्छ को कहा जाता है, वैसे ही पुण्यवान को
बूढे बैल
तत्थ मंदा विसीयंति, उज्जाणंसि जरग्गवा
चढ़ाई के मार्ग में बूढे बैलों की तरह साधनामार्ग की कठिनाई में अज्ञ लोग खि होते हैं


















