1 0
post icon

श्री सिद्धगिरिराज की यात्रा में करने के पाँच चैत्यवंदन

Sorry, this article is only available in English. Please, check back soon. Alternatively you can subscribe at the bottom of the page to recieve updates whenever we add a hindi version of this article.

Leave a Comment
post icon

शूरम्मन्य

शूरम्मन्य

सूरं मण्णइ अप्पाणं,
जाव जेयं न पस्सति

व्यक्ति तभी तक अपने को शूरवीर मानता है, जब तक विजेता को नहीं देख लेता

दुनिया में एक से बढ़कर एक लोग चारों ओर भरे पड़े हैं| कोई रूप में बड़ा है, कोई विद्या में – कोई धन में बड़ा है तो कोई शक्ति में|

शक्ति में भी कोई लाखों से बड़ा है; तो हजारों से छोटा भी हो सकता है; क्यों कि दुनिया बहुत बड़ी है| प्रत्येक सेर के लिए कहीं-न-कहीं सवासेर अवश्य मौजूद है| ऐसी अवस्था में आसपास के लोगों से अधिक योग्यता पा कर ही अपने को कोई यदि दुनिया में सबसे बड़ा मान बैठता है; तो यह उसकी भूल है| किसी दिन यदि उसे कोई अपने से बड़ा व्यक्ति मिल गया; तो उस दिन उसका सारा घमण्ड चूर-चूर हो जायगा| समझदार व्यक्ति इसीलिए कभी अपनी योग्यताओं का घमण्ड नहीं करते|

जो लोग ऐसा करते हैं, वे अविवेकी हैं| ऐसे लोग जब तक अपने से अधिक शक्तिशाली विजेता को नहीं देख लेते, तब तक अपने आप को शूरवीर मानते रहते हैं|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/3/1/1

Leave a Comment
post icon

Wallpaper #4

Know Thyself, Recognise Thyself,
Be Immersed By Thyself & you will attain Godhood

Standard Screen Widescreen
1024×768 1440×900
1600×1200 1920×1080

Leave a Comment
post icon

पापी की पीड़ा

पापी की पीड़ा

सकम्मुणा किच्चइ पावकारी

पाप करनेवाला अपने ही कर्मों से पीड़ित होता है

चोरी करनेवाला चारों ओर से सतर्क रहता है| वह फूँक-फूँक कर कदम रखता है| डरता रहता है कि कहीं कोई उसे देख न ले – रँगे हाथों पकड़ न ले| इस प्रकार अन्त तक वह भयकी वेदना से पीड़ित होता रहता है| चोरी पकड़ी जाने पर तो उसे जेल या शारीरिक दण्ड भी भोगने पड़ते हैं| Continue reading “पापी की पीड़ा” »

Leave a Comment
post icon

सदाचार का मूल

सदाचार का मूल

नादंसणिस्स नाणं, नाणेण विणा न होंति चरणगुणा

सम्यग्दर्शन के अभाव में ज्ञान प्राप्त नहीं होता और ज्ञान के अभाव में चारित्र-गुण प्राप्त नहीं होते

दृष्टि यदि सम्यक् न हो तो मनुष्य सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता; क्यों कि जबतक दृष्टि सम्यक् परक नहीं होगी, सम्यक् की खोज नहीं की जा सकेगी और इसके लिए आवश्यक होगा कि दृष्टि स्वयं भी सम्यक् हो| सम्यग्ज्ञान से पहले सम्यग्दर्शन होना चाहिये| Continue reading “सदाचार का मूल” »

Leave a Comment
post icon

दुःखप्रदायकता

दुःखप्रदायकता

सव्वे कामा दुहावहा

सभी काम दुःखप्रद होते हैं

यहॉं ‘काम’ शब्द का अर्थ कार्य नहीं हैं, तीसरा पुरुषार्थ है| हिन्दी में काम शब्द दोनों अर्थों में प्रचलित है| इस सूक्ति में कामनाओं के त्याग का परामर्श दिया गया है और इसका कारण बताया है – उनकी दुःखदायकता| Continue reading “दुःखप्रदायकता” »

Leave a Comment
post icon

मायामृषावाद

मायामृषावाद

सादियं न मुसं बूया

मन में कपट रखकर झूठ नहीं बोलना चाहिये

झूठ बोलना बुरा है; परन्तु उसकी बुराई की मात्रा का निर्णय तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक यह पता नहीं लग जाता कि झूठ बोलने का कारण और प्रयोजन क्या है| Continue reading “मायामृषावाद” »

Leave a Comment
post icon

जैन कहो क्युं होवे

Listen to जैन कहो क्युं होवे

भाव : जैनो नी परिभाषाने अने साचा जैनत्वने समजावतु वर्णन

जैन कहो क्युं होवे, परमगुरु!
जैन कहो क्युं होवे
गुरु उपदेश बिना जन मूढा,
दर्शन जैन विगोवे.

…परम.१

Read the lyrics

Leave a Comment
post icon

साधुओं की प्रसन्नता

साधुओं की प्रसन्नता

महप्पसाया इसिणो हवंति

ऋषि सदा प्रसन्न रहते हैं

जीवन में परिस्थियॉं कभी अनुकूल रहती हैं और कभी प्रतिकूल | प्रतिकूल परिस्थियों में जो धीरज खो देते हैं अर्थात् जिनका मानसिक सन्तुलन नष्ट हो जाता है, वे प्रसन्न नहीं रह सकते| जो अपने मन को क्षणिक सुख देनेवाली विषय-सामग्री एकत्र करने में लगा देते हैं, वे भी सदा अशान्त रहते हैं| Continue reading “साधुओं की प्रसन्नता” »

Leave a Comment
post icon

Quote #21

There are no shortcuts to any place worth going.
Beverly Sills
Leave a Comment
Page 1 of 6712345...102030...Last »