जो कार्य तुम आज कर सकते हो
उसे कल पर कदापि मत छोडो
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राग : एशके सामान सब एक दिन यहां रह जायेंगे
भाव : दुन्यवी चीजनी नश्वरता, आवता जन्मनी चिंता
मोहनो त्याग ने धर्मनो राग
मोह से तेरा कमाया, धन यहां रह जायगा;
प्रेमसे अति पुष्ट कीया, तन जलाया जायगा.
प्रभुभजनकी भावना बीन, परलोकमें क्या पायेगा
कुच्छ कमाइ यहां न कीनी, खाली हाथे जायेगा.
कर्तव्य तीसरा – क्षमापना
एक अमरिकन प्रेसिडेन्ट की पत्नी एक बार पागलों की अस्पताल की मुलाकात लेने गई| वहॉं उस संस्थाके एक सभ्य के साथ उसका मिलाप हुआ| दिखने में वह स्वस्थ, सुघड़ और बुद्धिमान दिखाई देता था| उसमें पागलपन का एक भी चिह्न दिखाई नहीं देता था| वार्तालाप करने की रीत भी सभ्य और अच्छी थी| उसकी ऐसी सभ्यता से प्रभावित होकर उस अमरिकन महिलाने रसपूर्वक पूछ लिया कि- क्या आप यहॉं के सुपरवाइज़र हो, या कर्मचारी हो ? उसने हँसकर और कुछ नाराजगीभरें भावसे कहा- ना जी ! मुझे यहॉं तीन सालसे पागल मानकर कैद कर रखा है| Continue reading “पर्युषण महापर्व – कर्तव्य तीसरा” »
For an understanding of any of the philosophies to be described, it is important to realize that they are religious in essence. Their aim is the direct mystical experience of reality and since this experience is religious by nature, they are inseparable from religion.Fritjof Capra
श्री शंखेश्वर पार्श्व जिन स्तवन
Continue reading “तारा रे नयनां प्याला” »
अनुभव नाथ कुं क्युं न जगावे?
आतम अनुभव फूल की, नवली कोउ रीत;
नाक न पकरे वासना, कान गहे परतीत ॥
अनुभव नाथ कुं क्युं न जगावे?
ममता संग सो पाय अजागल-थनतें दूध दुहावे

जब कल्पसूत्र, प्रभुका पारणा इत्यादि घर पर लाते हैं, तब घर भी मानो मंदिर बन जाता है| उस समय प्रभुके मंगलगीत, भावना इत्यादिद्वारा रात्रि जागरण करना वह श्रावक का कर्तव्य है| व्यापार-धंधा, ढ.त. इत्यादि के लिए रात्रि में एक-दो बजे तक जागनेवाले प्रायः रोज रात को अधर्म जागरण करते हैं क्योंकि सतत अशुभ भावोमें रहते हैं| Continue reading “रात्रि जागरण – साल का सातवा कर्तव्य” »
श्री संभवनाथ जिन स्तवन
हां रे हुं तो मोह्यो रे लाल,
जिन मुखडाने मटके;
जिन मुखडाने मटके वारी जाउं,
प्रभु मुखडाने मटके.
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आस्रव को न जानने वाले संवर को कैसे जान सकते है?