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मृदुता को अपनाइये

मृदुता को अपनाइये

माणं मद्दवया जिणे

मान को नम्रता या मृदुता से जीतें

आँधी बड़े-बड़े पेडों को उखाड़ फैंकती है; किंतु मैदान में फैली हुई दूब का कुछ नहीं बिगाड़ सकती| ऐसा क्यों? पेड़ घमण्ड से अकड़े हुए रहते हैं, किंतु दूब में नम्रता होती है अर्थात् मृदुता होती है| अकड़ से पेड़ उखड़ जाते हैं, नम्रता से दूब टिकी रहती है| वह अभिमानी व्यक्तियों का मार्गदर्शन करती है कि उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिये| Continue reading “मृदुता को अपनाइये” »

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शंका हो तो न बोलें

शंका हो तो न बोलें

जत्थ संका भवे तं तु,
एवमेयं ति नो वए

जिस विषय में अपने को शंका हो, उस विषय में ‘‘यह ऐसी ही है’’ ऐसी भाषा न बोलें

शंका एक ऐसी मनोवृत्ति है, जो हमें अपने अल्पज्ञान या अज्ञान का भान कराती रहती है| अज्ञान के भान से हमें लज्जा आती है और एक प्रकार का मानसिक कष्ट होता है| शास्त्रज्ञान के लिए जब हम आचार्यों या गुरुओं की उपासना करते हैं; तब भी उनके कठोर शब्दों का प्रहार हमें सहना पड़ता है| Continue reading “शंका हो तो न बोलें” »

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बुद्धिवाद

बुद्धिवाद

पा समिक्खए धम्मं

बुद्धि ही धर्म का निर्णय कर सकती है

महावीर ही थे, जिन्होंने ढाई-हजार वर्ष पहले इस सूक्ति के द्वारा बुद्धिप्रामाण्यवादका डिण्डिम घोष किया था| Continue reading “बुद्धिवाद” »

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सो क्या जाने पीर पराई ?

सो क्या जाने पीर पराई ?

जे अज्झत्थं जाणइ, से बहिया जाणइ|
जे बहिया जाणइ, से अज्झत्थं जाणइ|

जो अभ्यन्तर को जानता है, वह बाह्य को जानता है और जो बाह्य को जानता है वह अभ्यन्तर को जानता है

जो अपने सुख-दुःख को समझता है, वही व्यक्ति दूसरों के दुःख-सुख को समझ सकता है- यह एक अनुभूत तथ्य है| जिसे कभी भूखा या प्यासा रहने का अवसर ही न मिला हो, वह कैसे समझ सकता है कि भूख-प्यास में किसी को कितना कष्ट होता है? Continue reading “सो क्या जाने पीर पराई ?” »

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Continuation of Lord Rishabhdev’s life as a Sadhu

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Quote #5

The Eastern religious philosophies are concerned with timeless mystical knowledge, which lies beyond reasoning and cannot be adequately expressed in words. The relation of this knowledge to modern physics is but one of its many aspects and, like all the others, it cannot be demonstrated conclusively but has to be experienced in a direct intuitive way.
Fritjof Capra
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अमनोज्ञ शब्द न बोलें

अमनोज्ञ शब्द न बोलें

तुमं तुमं ति अमणुं, सव्वसो तं न वत्तए

तू, तुम जैसे अमनोहर शब्द कभी नहीं बोलें

मॉं को और ईश्‍वर को ‘तू’ कहा जाता है, शेष सबको ‘आप’ कहना चाहिये| ‘आप’ शब्द सन्मान दर्शक है| दूसरों से बातचीत करते समय अथवा पत्र व्यवहार में इसी शब्द का प्रयोग करना चाहिये| यदि हम दूसरों के लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करेंगे; तो दूसरे भी हमारे लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करके हमें सन्मान देंगे| Continue reading “अमनोज्ञ शब्द न बोलें” »

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मित्र-शत्रु कौन ?

मित्र शत्रु कौन ?

अप्पा मित्तममित्तं य, सुप्पट्ठियदुप्पट्ठियो

सदाचार-प्रवृत्त आत्मा मित्र है और दुराचारप्रवृत शत्रु

अपनी आत्मा ही मित्र है – यदि वह सुप्रवृत्त हो अर्थात् सदाचारनिष्ठ हो और अपनी आत्मा ही शत्रु है – यदि वह दुष्प्रवृत्त हो अर्थात् दुराचारनिष्ठ हो| Continue reading “मित्र-शत्रु कौन ?” »

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श्रावक के दैनिक 6 कर्तव्य

श्रावक के दैनिक 6 कर्तव्य

जिनेन्द्रपूजा गुरुपर्युपास्तिः
सत्वानुकम्पा शुभपात्रदानम्|
गुणानुरागः श्रुतिरागमस्य
नृजन्मवृक्षस्य फलान्यमूनि॥
पर्युषण के दिन यानी कि आत्माके लिए महोत्सव के दिन| इन दिनोमें विशिष्ट आराधना यानी कि आत्मा के लिए मिष्टान्न भोजन| लेकिन प्रसंग पर मिष्टान्न भोजन करनेवाला सामान्य से हररोज मिष्टान्न नहीं खाता, उसका मतलब उपवास नहीं करता… दाल, चावल, रोटी और सब्जी तो जीमता ही है| Continue reading “श्रावक के दैनिक 6 कर्तव्य” »

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Establishment of Customs

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