इहलोगे सुचिण्णा कम्मा
इहलोगे सुहफल विवाग संजुत्ता भवन्ति
इहलोगे सुहफल विवाग संजुत्ता भवन्ति
इस लोक में किये हुए सत्कर्म इस लोक में सुखप्रद होते हैं
इस लोक में किये हुए सत्कर्म इस लोक में सुखप्रद होते हैं
स्वाध्याय से ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय होता है
दुःख स्वकृत होता है, परकृत नहीं
पहले जो जैसा कर्म किया गया है, भविष्य में वह उसी रूप में उपस्थित होता है
क्रोधविजय क्षमा का जनक है
जीवन और रूप विद्युत् की गति के समान चंचल होते हैं
मेधावी साधक को आत्मपरिज्ञान के द्वारा यह निश्चय करना चाहिये कि मैंने पूर्वजीवन में प्रमादवश जो कुछ भूल की है, उसे अब कभी नहीं करूँगा
जैसे पुण्यवान को कहा जाता है, वैसे ही तुच्छ को और जैसे तुच्छ को कहा जाता है, वैसे ही पुण्यवान को
अज्ञ अभिमान करते हैं
माया को ऋजुता से और लोभ को सन्तोष से जीतें