विग्रह बढ़ानेवाली बात नहीं करनी चाहिये
विग्रहवर्धक बात न कहें
न य विग्गहियं कहं कहिज्जा
बहुत-से लोगों की यह आदत होती है कि वे अधूरी बातें सुन-सुनाकर कलह उत्पन्न कर देते हैं| कभी-कभी अपनी ओर से नमक-मिर्च लगाकर वे बात का बतंगड बना देते हैं – तिल का ताड़ कर देते हैं और राई का पहाड़| Continue reading “विग्रहवर्धक बात न कहें” »
अति मात्रा में नहीं लेते
नाइमत्तपाणभोयणभोई से निग्गंथे
जो अति मात्रा में अ-जल ग्रहण नहीं करता, वही निर्ग्रन्थ है
भगवान सत्य
तं सच्चं भगवं
सत्य ही भगवान है
अदीनभाव से रहो
अदीणमणसो चरे
अनन्यदर्शी बनें
जो अणण्णदंसी से अणण्णारामे
जो अनन्यदर्शी होता है, वह अनन्याराम होता है और जो अनन्याराम होता है, वह अनन्यदर्शी होता है
एकज्ञ-सर्वज्ञ
जे एगं जाणइ से सव्वं जाणइ|
जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ||
जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ||
जो एक को जानता है, वह सबको जानता है और जो सबको जानता है, वह एक को जानता है
जिसे आत्मस्वरूप का सम्यग्ज्ञान हो जाता है, वह अनात्मतत्त्वों में रमण नहीं करता; क्यों कि वह आत्मभि पदार्थों के स्वरूप को – उनकी क्षणिकताको भी जान लेता है| Continue reading “एकज्ञ-सर्वज्ञ” »
सम्यक्त्व के अभाव में
नत्थि चरित्तं सम्मत्तविहूणं
सम्यक्त्व के अभाव में चारित्र नहीं हो सकता
मूर्त्त या अमूर्त्त
नो इन्दियग्गेज्झ अमुत्तभावा,
अमुत्तभावा वि य होइ निच्चं
अमुत्तभावा वि य होइ निच्चं
आत्मा आदि अमूर्त्त तत्त्व इन्द्रियग्राह्य नहीं होते और जो अमूर्त्त होते हैं, वे नित्य भी होते हैं
समय पर पूरा कीजिये
जेहिं काले परक्कंतं,
न पच्छा परितप्पए
न पच्छा परितप्पए
जो समय पर अपना काम कर लेते हैं, वे बाद में पछताते नहीं है
ज्ञान और सदाचार
न संतसंति मरणंते,
सीलवंता बहुस्सुया
सीलवंता बहुस्सुया
ज्ञानी और सदाचारी मृत्युपर्यन्त त्रस्त (भयाक्रान्त) नहीं होते


















