जं जारिसं पुव्वमकासि कम्मं,
तमेव आगच्छति संपराए
तमेव आगच्छति संपराए
पहले जो जैसा कर्म किया गया है, भविष्य में वह उसी रूप में उपस्थित होता है
पहले जो जैसा कर्म किया गया है, भविष्य में वह उसी रूप में उपस्थित होता है
क्रोधविजय क्षमा का जनक है
जीवन और रूप विद्युत् की गति के समान चंचल होते हैं
मेधावी साधक को आत्मपरिज्ञान के द्वारा यह निश्चय करना चाहिये कि मैंने पूर्वजीवन में प्रमादवश जो कुछ भूल की है, उसे अब कभी नहीं करूँगा
जैसे पुण्यवान को कहा जाता है, वैसे ही तुच्छ को और जैसे तुच्छ को कहा जाता है, वैसे ही पुण्यवान को
अज्ञ अभिमान करते हैं
माया को ऋजुता से और लोभ को सन्तोष से जीतें
हितकर सच्ची बात कहनी चाहिये
चढ़ाई के मार्ग में बूढे बैलों की तरह साधनामार्ग की कठिनाई में अज्ञ लोग खि होते हैं
जो एक अपने को नमा लेता है; वह बहुतों को नमा लेता है