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आलोचना-प्रायश्चित्त लेकर शुद्ध बनी पुष्पचूला

आलोचना प्रायश्चित्त लेकर शुद्ध बनी पुष्पचूला
पुष्पभद्र नगर में पुष्पकेतु नाम का राजा था| उसकी पुष्पवती नाम की रानी थी| उसने पुष्पचूल और पुष्पचूला नाम के युगल को जन्म दिया| पुष्पचूल और पुष्पचूला परस्पर अत्यन्त प्रेम से बड़े हुए| दोनों एक दूसरे से अलग नहीं रह सकते थे| अब राजा विचार करने लगा कि यदि पुत्री पुष्पचूला का विवाह अन्यत्र करूँगा, तो दोनों का वियोग हो जाएगा| अतः उसने प्रजाजनों की सभा बुलाई| सभा में पुष्पकेतु राजाने प्रश्‍न किया कि अगर मेरी धरती पर रत्न उत्पन्न हो जाये, तो उसे कहॉं जोड़ना, यह अधिकार किसका है? Continue reading “आलोचना-प्रायश्चित्त लेकर शुद्ध बनी पुष्पचूला” »

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संग्रह न करे !

संग्रह न करे !

बहुं पि लद्धुं न निहे

अधिक प्राप्त होने पर भी संग्रह नहीं करना चाहिये

पानी का एक जगह संग्रह हो जाये और उसे इधर-उधर बहने का अवसर न मिले; तो वह पड़ा-पड़ा सड़ने लगता है| धन का भी यही हाल होता है| यदि वह अधिक मात्रा में एकत्र हो जाये जो उसे सुरक्षित रखने की चिन्ता सिर पर सवार हो जाती है| कुटुम्बी, चोर, डाकू सभी उसके पीछे लग जाते हैं और छीनने की कोशिश करते हैं| Continue reading “संग्रह न करे !” »

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विषय-विरक्ति

विषय विरक्ति

वंतं इच्छसि आवेउं, सेयं ते मरणं भवे

वान्त पीना चाहते हो ? इससे तो तुम्हारा मर जाना अच्छा है

थूक को चाटना किसे अच्छा लगता है ? कै (वमन) में मुँह से बाहर निकली वस्तु को भला कौन पीना चाहेगा? कोई नहीं| थूक और वान्त से सभी घृणा करते हैं और इन्हें पुनः उदरसात् करने की अपेक्षा मर जाना अच्छा समझते हैं| Continue reading “विषय-विरक्ति” »

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Birth Ceremonies

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अनेकान्तवादी बनें

अनेकान्तवादी बनें

विभज्जवायं च वियागरेज्जा

स्याद्वाद से युक्त वचनों का प्रयोग करना चाहिये

‘स्याद्वाद’ एक दार्शनिक सिद्धान्त है| ‘स्यात्’ का अर्थ अपेक्षा है; इसलिए इसे सापेक्षवाद भी कह सकते हैं| वैसे किसी एक बात का आग्रह न होने से यह ‘अनेकान्तवाद’ के नाम से ही दुनिया में अधिक प्रसिद्ध है| Continue reading “अनेकान्तवादी बनें” »

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शेठ मोतीषा

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ज्ञान का सार

ज्ञान का सार

एवं खु णाणिणो सारं,
जं न हिंसइ किंचणं

अहिंसा या दया एक धर्म है; किन्तु इसका सम्यक् परिपालन करने से पहले ज्ञान होना आवश्यक है

जो व्यक्ति जीवाजीवादि नव तत्त्वों को अच्छी तरह से जान लेता है – इनके स्वरूप को हृदयंगम कर लेता है, वही सच्चा अहिंसक बन सकता है| Continue reading “ज्ञान का सार” »

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सम्यग्दृष्टि में स्थिरता

सम्यग्दृष्टि में स्थिरता

से दिट्ठिमं दिट्ठि न लूसएज्जा

सम्यग्दृष्टि साधक को सत्यदृष्टि का अपलाप नहीं करना चाहिये

जिसकी दृष्टि सम्यक् है, उसे कभी अपनी दृष्टि को शिथिल नहीं करना चाहिये| एक बार जिस व्यक्ति का जैसा दृष्टिकोण बन जाता है, उसे वैसा ही दिखाई देता है| Continue reading “सम्यग्दृष्टि में स्थिरता” »

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पर्युषण महापर्व – कर्तव्य दूसरा

पर्युषण महापर्व   कर्तव्य दूसरा

कर्तव्य दूसरा – साधर्मिक भक्ति

द्वितीय कर्त्तव्य… साधर्मिक भक्ति ‘‘मेरा सो मेरा ही’’ ऐसी स्वार्थ वृत्ति को दूर करता है| बुद्धिनिधान अभयकुमार नामक साधर्मिक ने कालसौरिक कसाइर्२ के पुत्र सुलस को जैनधर्म-अहिंसा की प्रेरणा देकर हिंसक धंधे से दूर होने के लिए जोर-बल दिया था| मृत्यु के समय भाई के प्रति द्वेष रखने के कारण नरकमें जाकर संसार वनमें भटकने के लिए तैयार युगबाहु को पत्नी मदनरेखाने कल्याणमित्र की भूमिका बजा कर-सच्चा रिश्ता साधर्मिक का इस बात को सिद्ध करके… भाई के प्रति वैरभाव से जो असमाधि उत्पन्न हुई थी, उसको दूर करके सद्गति दिलाई और संसारमें भटकने से बचा लिया था| Continue reading “पर्युषण महापर्व – कर्तव्य दूसरा” »

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