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कठोर वाणी न बोलें

कठोर वाणी न बोलें

नो वयणं फरूसं वइज्जा

वाणी भी दो तरह की होती है – कठोर और कोमल| क्रोध और क्रूरता में वाणी कठोर निकलती है तथा विनय और शान्ति में कोमल | करुणा, दया, सहानुभूति, प्रेम, ममता, मोह, स्नेह और माया की वाणी कोमल होती है| इसके विपरीत निष्ठुरता, निर्दयता, द्वेष, क्रोध आदि में वाणी कठोर निकलती है| Continue reading “कठोर वाणी न बोलें” »

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सन्तोषी पाप नहीं करते

सन्तोषी पाप नहीं करते

सन्तोसिणो नो पकरेंति पावं

सन्तोषी पाप नहीं करते

लोभ पाप का मूल कारण है| ज्यों-ज्यों व्यक्ति लाभान्वित होता जाता है, त्यों-त्यों वह अधिक से अधिक पापमार्ग में प्रवृत होता जाता है; क्यों कि लाभ के अनुपात में उसका लोभ बढ़ता रहता है, जो अनुचित एवं अन्यायपूर्ण कार्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करता रहता है| Continue reading “सन्तोषी पाप नहीं करते” »

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प्रणमुं तुमारा पाय

Listen to प्रणमुं तुमारा पाय

भाव : मन… चंचलता मननी निर्मलता मननी निश्‍चलता
प्रसन्नचंद्रनी ७मी नरक अनुत्तर विमान.. ने केवलज्ञाननी साधना

प्रणमुं तुमारा पाय,
प्रसन्नचंद्र प्रणमुं तुमारा पाय;
तुमे छो मोटा ऋषिराय…

राज छोडी रळीयामणुं रे, जाणी अथीर संसार,
vवैरागे मन वाळीयुं रे, लीधो संयम भार

…प्रसन्न 01

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सिंह-सी निर्भयता

सिंह सी निर्भयता

सीहो व सद्देण न संतसेज्जा

सिंह के समान निर्भीक; केवल शब्दों से न डरिये

सिंह कितना निर्भय होता है! हाथी की चिंघाड़ से भी वह नहीं डरता| यद्यापि हाथी के शरीर से उसका शरीर बहुत छोटा होता है; फिर भी उसकी साहसिकता – उसकी वीरता उसमें प्रशंसनीय निर्भयता के भाव जगा देती है, जिससे कि वह चिंघाड़ के प्रति भी लापरवाह बन जाता है| इसी प्रकार वीर पुरुष भी शत्रुओं की ललकार से नहीं डरते; जो डर जाते हैं, वे वीर नहीं कायर हैं| Continue reading “सिंह-सी निर्भयता” »

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शिक्षा का प्रारम्भ

शिक्षा का प्रारम्भ

एवं खु तप्पालणे वि धम्मो
एक दिन एक महिला एक वरिष्ठ ज्ञानी व्यक्ति के पास गई और पूछा, ‘‘बाबा, कृपा करके मुझे यह बताइए कि मुझे अपने नन्हें-मुन्ने बेटे की शिक्षा कब प्रारम्भ करनी चाहिए?’’ Continue reading “शिक्षा का प्रारम्भ” »

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सम्मान की इच्छा मत करो

सम्मान की इच्छा मत करो

सम्माननं परां हानिं योगर्द्धेः कुरुते यतः
उत्तम पुरुष विकारों से विमुक्त होता हुआ पूजा एवं यश का इच्छुक न बनकर जीवन व्यतीत करता है| तुम्हें कोई भाग्यवान कहे तो फूलो मत… तुम्हें कोई बुद्धिमान या धनवान कहे तो खिलो मत… क्योंकि उनका बुद्धि का तराजू पत्थर तोलने का है… हीरा तोलने का नहीं| ध्वनियों में सबसे मधुर है प्रशंसा की ध्वनि| अतः इस ध्वनि से बचते रहो… कम से कम धर्म के अनुष्ठान तो कीर्ति, यश और प्रशंसा से दूर रहकर ही करें|

करनी ऐसी कीजिए जिसे न जाने कोय|
जैसे मेहंदी पात में बैठी रंग छुपाय॥

काम करना आपका काम है…..बस सिर्फ काम करें…..नाम नहीं चाहें…..धर्म करना आपकी आत्मा का स्वभाव है, तो सम्मान की इच्छा मत करो|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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हिंसा न करें

हिंसा न करें

सव्वेसिं जीवियं पियं,
नाइवाएज्ज कंचणं

सबको जीवन प्रिय है, किसीके प्राणों का अतिपात नहीं चाहिये

कौन प्राणी है, जो जीवित रहना नहीं चाहता? अपना-अपना जीवन सभीको प्यारा लगता है| मनुष्य का जीवन कितना मूल्यवान् है – इसका पता तब लगता है, जब उसके सामने एक ओर करोड़ों स्वर्णमुद्राओं के साथ उसकी मृत्यु तथा दूसरी ओर साधारण अबल के साथ उसका जीवन रखकर इनमें से किसी एक का चयन करने के लिए उसे कहा जाये| Continue reading “हिंसा न करें” »

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मत बन विषय विलासी रे मनवा

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राग : कित गुण भयो है उदासी बिहाग
भाव : विषय विलास = आत्म विनाश एना त्यागनी पावन प्रेरणा

मत बन विषय विलासी रे मनवा,
ए जबरी जग फांसी. रे मनवा.
हतस्त हरिण मच्छ भ्रमर पतंग,
एक एक विषयना आशी.

…रे म.१

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