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पर्युषण महापर्व – तीसरा दिन

पर्युषण महापर्व   तीसरा दिन

पर्वाणि सन्ति प्रोक्तानि, बहूनि श्री जिनागमे|
पर्युषणासमं नान्यत् कर्मणां मर्मभेदकृत्॥
दक्षिण ध्रुवमें कई सालोंसे बरफवर्षा होती है| इसलिए जमीन पर बरफ के ऐसे स्तर जमे हैं कि ५-६ माईल तक खुदाई करने पर भी जमीन का स्पर्श नहीं कर पाते| मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योगके कारण अनंतभवोंसे अपनी आत्मा पर भी लगातार कर्मोंकी वर्षा हो रही है| Continue reading “पर्युषण महापर्व – तीसरा दिन” »

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साध्वी यकिनी महत्तरा

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डरना नहीं चाहिये

डरना नहीं चाहिये

ण भाइयव्वं, भीतं खु भया अइंति लहुयं

डरना नहीं चाहिये| भीत के निकट भय शीघ्र आते हैं

डरता वही है, जो अपराधी है – पापी है – हत्यारा है| चोर और व्यभिचारी भी निरन्तर डरते रहते हैं कि कहीं कभी कोई उन्हें देख न ले – रंगे हाथों चोरी या व्यभिचार करते हुए पकड़ न ले| Continue reading “डरना नहीं चाहिये” »

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संयम और तप

संयम और तप

संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणे विहरइ

संयम और तप से आत्मा को भावित (पवित्र) करता हुआ साधक विहार करता है

राग-द्वेष, विषय-कषाय से कलुषित आत्मा किसी शरीर का आश्रय लेकर इस विशाल संसार में भटकती रहती है| उसका यह भवभ्रमण तब तक नहीं मिट सकता, जब तक उसका वह कालुष्य नहीं मिट जाता, जो उसे इस प्रकार भटकने को विवश करता रहता है| Continue reading “संयम और तप” »

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दुःख कोई बाँट नही सकता

दुःख कोई बाँट नही सकता

अस्स दुक्खं ओ न परियाइयति

कोई किसी दूसरे के दुःख को बाँट नहीं सकता

मनुष्य दुःखी इसलिए होता है कि वह प्रमादवश भूलें करता रहता है| दुःख भूलों का अनिवार्य परिणाम है| जो भूलें करेगा, वह इस परिणाम से नहीं बच सकेगा| Continue reading “दुःख कोई बाँट नही सकता” »

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मृत्यु का आगमन

मृत्यु का आगमन

नत्थि कालस्स णागमो

मृत्यु किसी भी समय आ सकती है

मृत्यु! कितना भयंकर शब्द है यह? कौन इसे पाना चाहता है? कोई नहीं! घर में किसी की मृत्यु हो जाये तो सारा परिवार शोकसागर में निमग्न हो जाता है| Continue reading “मृत्यु का आगमन” »

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परिहास न करें

परिहास न करें

न यावि पे परिहास कुज्जा

बुद्धिमान को कभी उपहास नहीं करना चाहिये

रोग की जड़ खॉंसी! झगड़े की जड़ हँसी!! यदि द्रौपदी ने हँसी उड़ाते हुए दुर्योधन के लिए ऐसा नहीं कहा होता कि अन्धे के बेटे भी आखिर अन्धे ही होते हैं; तो शायद इतना बड़ा महाभारत युद्ध न हुआ होता| Continue reading “परिहास न करें” »

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Personal Description of the Lord

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उत्तम शरण

उत्तम शरण

धम्मो दीवो पइट्ठा य, गई सरणमुत्तमं

धर्म द्वीप है, प्रतिष्ठा है, गति है और उत्तम शरण है

समुद्र में तैरते हुए जो व्यक्ति थक कर चूर हो जाता है, उसे द्वीप मिल जाये तो कितना सुख मिलेगा उससे ? धर्म भी संसार रूप सागर में तैरते हुए जीवों के लिए द्वीप के समान सुखदायक है| Continue reading “उत्तम शरण” »

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जीव विचार – गाथा 2

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