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मुक्त मन से दो

मुक्त मन से दो

परोपकाराय सतां विभूतयः
जो तुम्हारे पास है उसे दूसरों को देने में तु स्वतंत्र हो अतः जब देने का अवसर हो तो मुक्त मन से देना सीखो| यह चिन्तन मेरे मन में सदा रहे कि मेरे पास जो कुछ है वह मैं दूसरों को पहुँचाऊँ…..प्रकृति ने हमें देने के लिए समय, समझ, सामग्री और सामर्थ्य दिया है उसे दूसरो के हित में लगा देना चाहिए|

इसके लिए हम इतने पुण्यशाली बनें कि जो मेरे पास है वह मैं दूसरों को उदारता से दूँ| सृष्टि का एक नियम है जो दिया जाता है वही लौटता है जो हम दे सकते हैं उसे ईानदारी से देते रहना चाहिए|

जीवन में जिसने बॉंटा उसी ने पाया और जिसने संभाला उसी ने गँवाया अतः जब देना ही है तो शत्रु हो या मित्र सभी को समान रूप से दो| कितना भी दे दोगे तो भी खजाने में कुछ कमी नहीं आएगी|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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शामळीयो त्यागीने हुं तो रागी

Listen to शामळीयो त्यागीने हुं तो रागी

श्री नेमिनाथ जिन स्तवन
राग : श्याम तेरी बंसी…

शामळीयो त्यागीने हुं तो रागी,
संयम शुं रढ मने लागीरे लागी हो व्हाला..
ओ.. व्हाला रे मारा नेम नगीना निरागी,
व्हाला रे मारा सुंदर श्याम सौभागी
संयम लीये हुआ रे वडभागी.

…संयम.१

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जीव विचार – गाथा 5

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शीशा

शीशा

ईश्‍वर ने हमें केवल एक चेहरा दिया है और दूसरा हम स्वयं बना लेते हैं

नीना बड़ी गुस्सैल और बदमिजाज लड़की थी| अक्सर नीना की मॉं उसे ऐसी आदतों से छुटकारा पाने के लिए समझाती; पर नीना थी कि उस पर किसी बात का असर ही नहीं होता था| Continue reading “शीशा” »

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श्री अनाथि मुनि

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सुखद और दुःखद

सुखद और दुःखद

खणमित्तसुक्खा बहुकालदुक्खा

विषयभोग क्षणमात्र सुख देते हैं, किंतु बहुकाल पर्यन्त दुःख देते हैं

दिन के बाद रात और रात के बाद दिन अथवा अँधेरे के बाद उजाला व उजाले के बाद अँधेरा क्रम से आता रहता है, उसी प्रकार सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख का आगमन जीवन में होता रहता है – अनुकूल परिस्थितियॉं पा कर कभी हम हँसते हैं तो प्रतिकूल परिस्थितियॉं पा कर रोते भी हैं| Continue reading “सुखद और दुःखद” »

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कर्मों से कष्ट

कर्मों से कष्ट

सकम्मुणा विप्परियासुवेइ

अपने किये कर्मों से ही व्यक्ति कष्ट पाता है

दुनिया में विषमता है| कोई जन्म ले रहा है, कोई जन्म दे रहा है – कोई जी रहा है, कोई मर रहा है – कोई धन पा रहा है, कोई खो रहा है – कोई जाग रहा है, कोई सो रहा है – कोई हँस रहा है, कोई रो रहा है – कोई सुखी है, कोई दुःखी| Continue reading “कर्मों से कष्ट” »

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भगवती अहिंसा

भगवती अहिंसा

भगवती अहिंसा…. भीयाणं पि व सरणं

भगवती अहिंसा भीतों (डरे हुओं) के लिए शरण के समान है

भीत अर्थात् संकटग्रस्त डरा हुआ व्यक्ति अपनी सुरक्षा के लिए किसी समर्थ व्यक्ति की शरण ढूँढता है| शरण या आश्रय मिल जाने पर शरणार्थी सन्तुष्ट हो जाता है – निर्भय हो जाता है; वैसे ही भगवती अहिंसा का आश्रय लेने पर भी व्यक्ति सन्तुष्ट एवं निर्भय हो जाता है| Continue reading “भगवती अहिंसा” »

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तीर्थप्रभावना – साल का दसवां कर्तव्य

तीर्थप्रभावना   साल का दसवां कर्तव्य
श्रावक की क्रिया, श्रावक के प्रत्येक अनुष्ठान, श्रावक का वेश, श्रावक की भाषा, श्रावक के आचार, दुनिया के साथ श्रावक का व्यवहार इत्यादि ऐसे होने चाहिए कि जिसे देखकर दूसरों को उस श्रावक पर और उसके द्वारा जैन धर्म प्रति अहोभाव हो जाए| नौकर को भी कौटुंबिक पुरुष समझना चाहिए और उसे भी सभी आराधना में जोडना चाहिए और धर्म करने के लिए अनुकूलता कर देनी चाहिए| इसतरह अजैन को जैन बनाएँ और जैनको यथार्थ जैन बनाएँ| Continue reading “तीर्थप्रभावना – साल का दसवां कर्तव्य” »

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