दुःख स्वकृत होता है, परकृत नहीं
दुःख परकृत नहीं होता
भक्तामर स्तोत्र – श्लोक 3
बुद्धया विनाऽपि विबुधार्चित-पादपीठ!
स्तोतुं समुद्यत-मति-र्विगतत्रपोहम् |
बालं विहाय जल-संस्थितमिन्दुबिम्ब
मन्यः क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम् ? ||3||
मां की, बेटी को सीख

रानी ने कहा, मदनसेना ! दाम्पत्य जीवन की दिव्यता-शोभा तभी है, जब कि पति-पत्नी सत्ता का मोह छोड़कर परस्पर सेवाभाव, त्यागवृत्ति को अपनाए| अब तुम पराये घर जा रही हो| ससुराल में देव, गुरु, धर्म, स्वधर्मी बन्धु, देवर जेठ नणंद-भोजाई, सास-ससुर, दीन-दु:खी, रोगी और अपने अड़ोस-पड़ोस की सेवा का सारा भार तुम्हारें पर है| इसे ठीक तरह से निभाना| Continue reading “मां की, बेटी को सीख” »
गुरुदेव को वन्दन

गुरु भगवंत को विधिपूर्वक वन्दन करता हूँ… नमस्कार करता हूँ… सत्कार करता हूँ… सम्मान करता हूँ… Continue reading “गुरुदेव को वन्दन” »
कर्मों का बन्धन
तमेव आगच्छति संपराए
पहले जो जैसा कर्म किया गया है, भविष्य में वह उसी रूप में उपस्थित होता है
इच्छाएं कम करो
समता रखो

मेरी समता हर स्थिति में बनी रहे…..जो स्वीकार भाव की क्षमता को बढ़ा सकता है वही सुख-चैन से जी सकता है| Continue reading “समता रखो” »
क्षमा का जन्म
क्रोधविजय क्षमा का जनक है
जीवन और रूप
जीवन और रूप विद्युत् की गति के समान चंचल होते हैं
भूल दुहराऊँगा नहीं !
जमहं पुव्वमकासो पमाएणं
मेधावी साधक को आत्मपरिज्ञान के द्वारा यह निश्चय करना चाहिये कि मैंने पूर्वजीवन में प्रमादवश जो कुछ भूल की है, उसे अब कभी नहीं करूँगा















