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शंकाशील न बनें

शंकाशील न बनें

वितिगिच्छासमावेणं अप्पाणेणं
नो लहइ समाहिं

शंकाशील व्यक्ति को कभी समाधि नहीं मिलती

साधक अपनी साधना प्रारम्भ करने से पहले सद्गुरु के प्रवचन सुनता है| उससे शास्त्रों के प्रति रुचि जागृत होती है| फिर स्वयं शास्त्रों का अध्ययन करके अपने लिए एक मार्ग चुनता है – जीवन की उत्कृष्ट पद्धति को समझता है – उस पर ऊहापोह करके, चिन्तन मनन करके अपना विश्‍वास स्थिर करता है और फिर उठकर चल पड़ता है – चलता रहता है, जब तक उसे सिद्धि प्राप्त नहीं हो जाती| Continue reading “शंकाशील न बनें” »

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क्षमा – सच्चा अमृत

क्षमा   सच्चा अमृत
‘‘क्षमा’’ ही सच्चा अमृत है’’, इस बात को सभी विद्वानोंने मान्य कर दी| बस, संवत्सरी पर्व का आलंबन लेकर शक्कर – इलायची के पानी से भी अधिक मधुरतावाले क्षमामृत के प्याले ही भर भर के पीओ और पिलाओ| Continue reading “क्षमा – सच्चा अमृत” »

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पीठ का मांस न खायें

पीठ का मांस न खायें

पिट्ठिमंसं न खाएज्जा

पीठ का मांस नहीं खाना चाहिये अर्थात् किसी की निन्दा उसकी अनुपस्थिति में नहीं करनी चाहिये

किसीकी पीठ पीछे बुराई करना अपनी कायरता का प्रतीक है| यदि किसी की बुराई को नष्ट करना हमारा उद्देश्य है तो हमें उसकी बुराई उसके सामने ही प्रकट करनी चाहिये, जिससे कि विचार करके वह उसे छोड़ सके| Continue reading “पीठ का मांस न खायें” »

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महर्षि और संयत

महर्षि और संयत

अणुए नावणए महेसी,
न यावि पूयं, गरिहं च संजए

जो पूजा पा कर भी अहंकार नहीं करता और निन्दा पाकर भी अपने को हीन नहीं मानता; वह संयत महर्षि है

महर्षि कौन? जिसमें न अहंकार हो न दीनता| संयत कौन? निन्दा और प्रशंसा में जो समभावी हो| Continue reading “महर्षि और संयत” »

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साधु-सम्पर्क

साधु सम्पर्क

कुज्जा साहूहिं संथवं

साधुओं से सम्पर्क रखना चाहिये

संस्तव का अर्थ है – परिचय, सम्पर्क या संगति|

संगति पूरे जीवन को प्रभावित करती है| वह उन्नति के द्वार खोल देती है| एक कीट – कितना साधारण जीवन होता है उसका? परन्तु फूलों के साथ रहकर भगवान की मूर्ति के सिरपर जा पहुँचता है वह| एक छोटी नदी या नाला गंगा के साथ मिलकर कहॉं जा पहुँचता है? रत्नाकर समुद्र में| Continue reading “साधु-सम्पर्क” »

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Real education is the key to success

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The Gods – Their Cars – Their Bells their Family – Part 2

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हिंसा के कारण

हिंसा के कारण

कुद्धा हणंति, लुद्धा हणंति, मुद्धा हणंति

क्रुद्धा लुब्ध और मुग्ध हिंसा करते हैं

प्रमादवश प्राणियों के प्राणों को चोट पहुँचाना हिंसा है| हिंसा से सदा दूसरों को दुःख होता है| मनुष्य क्यों दूसरों को दुःख देता है? क्यों हिंसा करता है? इस पर विचार करके ज्ञानियों ने तीन कारण बतलाये हैं| Continue reading “हिंसा के कारण” »

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भरत – बाहुबली

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बनी मिट्टी की सब बाजी

Listen to बनी मिट्टी की सब बाजी

राग : गझल
भाव : आत्मा एक सोनुं बाकी बधु माटी… माटे आत्मा दशानी शोधनो संदेश

बनी मिट्टीकी सब बाजी, उसीमें होत क्यों राजी
मिट्टी का है शरीर तेरा, मिट्टीका कपडा पहेरा;
मिट्टी का म्हेल रहा छाजी, उसीमें होत क्यों राजी.

…बनी. १

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