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दुःख और तृष्णा

दुःख और तृष्णा

दुक्खं हयं जस्स न होइ मोहो,
मोहो हओ जस्स न होइ तण्हा

जिसमें मोह नहीं होता, उसका दुःख नष्ट हो जाता है और जिसमें तृष्णा नहीं होती उसका मोह नष्ट हो जाता है

तृष्णा बड़े-बड़े धैर्यशालियों के भी छक्के छुड़ा देती है – आँख वालों को भी अन्धा बना देती है, अन्धेरी रात में आँखवालों को जिस प्रकार पास में पड़ी हुई वस्तु भी दिखाई नहीं देती, उसी प्रकार तृष्णाग्रस्त व्यक्ति को अपने पास रही हुई सम्पत्ति भी दिखाई नहीं देती और वह अधिक से अधिक सम्पत्ति पाने की कोशिश में लगा रहता है – जीवन भर घानी के बैल की तरह परिश्रम करता रहता है| Continue reading “दुःख और तृष्णा” »

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देवद्रव्य की वृद्धि – साल का पाँचवा कर्तव्य

देवद्रव्य की वृद्धि   साल का पाँचवा कर्तव्य
पूर्वके कालमें जिनालयों को खंडित करने के प्रसंग अधिक बनते थे| मुसलमान बादशाह-सुबा इत्यादिने बहुत जिनालयों को खंडित किया| दूसरी तरफ परदेशिओं के राज्यमें जैन व्यापारिओं को असुविधा के कारण आमदानी का प्रश्न भी खडा हुआ| जिनालयों के आधार पर टीकी हुई जैन परंपरा का नाश हो जाए ऐसी परिस्थिति का भी निर्माण होने लगा| अतः उस समय देवद्रव्य की विशेष आवश्यकता खडी हुई| स्वप्न की बोली इत्यादिसे संचित हुई देवद्रव्य की राशिसे जिनालयों के जिर्णोद्धारादि कार्य शुरु रहने से ही आज हमें भव्य जिनालयों का मीरास मिला है| Continue reading “देवद्रव्य की वृद्धि – साल का पाँचवा कर्तव्य” »

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मेरे घट ग्यान भानु भयो भोर

Listen to मेरे घट ग्यान भानु भयो भोर

मेरे घट ग्यान भानु भयो भोर
मेरे घट ग्यान भानु भयो
भोर चेतन चकवा चेतना चकवी,
भागो विरह को सोर…
मेरे घट ग्यान भानु भयो भोर.

…१

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जीव विचार – गाथा 7

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न तृप्ति, न तृष्टि

न तृप्ति, न तृष्टि

देवावि सइंदगा न तित्तिं न तुट्ठिं उवलभन्ति

इन्द्रों सहित देव भी (विषयों से) न कभी तृप्त होते हैं, न सन्तुष्ट

पॉंच इन्द्रियॉं हैं और उनके अलग-अलग विषय हैं| जीवनभर जीव विषय-सामग्री को जुटाने के लिए दौड़-धूप करता रहता है| एक इन्द्रिय के विषय जुटाने पर दूसरी इन्द्रिय के और दूसरी के बाद तीसरी, चौथी और पॉंचवी इन्द्रिय के विषय क्रमशः जुटाने पड़ते हैं| Continue reading “न तृप्ति, न तृष्टि” »

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सब कुछ तुम्हारी पात्रता पर निर्भर है

सब कुछ तुम्हारी पात्रता पर निर्भर है
अगर तुम्हारा पात्र भीतर से बिलकुल शुद्ध है, निर्मल है, निर्दोष है, तो जहर भी तुम्हारे पात्र में जाकर निर्मल और निर्दोष हो जाएगा| Continue reading “सब कुछ तुम्हारी पात्रता पर निर्भर है” »

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अइमुत्ता मुनि

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कर्म का मूल हिंसा

कर्म का मूल हिंसा

कम्ममूलं च जं छणं

जो क्षण है, वह कर्म का मूल है

‘क्षण’ शब्द ‘क्षणवधे’ इस तनादि गण की उभयपदी सकर्मक धातु से बना है, जिसका अर्थ है – हिंसा| वैसे इस शब्द के और भी अनेक अर्थ हैं – निमेषक्रिया का चतुर्थ भाग, उत्सव, अवसर आदि; परन्तु इस सूक्ति में उस का मूल अर्थ ‘वध’ या ‘हिंसा’ ही ठीक लगता है| Continue reading “कर्म का मूल हिंसा” »

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चहक एक चिड़िया की

चहक एक चिड़िया की
एक पेड़ पर चिड़िया अपनी मस्ती में चहक रही थी| उस पेड़ के नीचे एक भक्त विश्राम कर रहा था| चिड़िया की चहक सुनकर भक्त बोला, ‘‘अहा ! चिड़िया भी भगवान को याद कर रही है|’’ Continue reading “चहक एक चिड़िया की” »

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नाम कर्म

नाम कर्म
किसी को रुपवान शरीर होता है,
किसी को कुरुप शरीर होता हैं, Continue reading “नाम कर्म” »

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