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पुनिया श्रावक

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श्री हीरसूरि गुरुराय

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राग : धनाश्री
भाव : जगद्गुरु हीर सूरिजी म. सा. नुं जीवन वृत्तांत

श्री हीरसूरि गुरुराय,
हमारा हीरसूरि गुरुराय
प्रणमुं प्रभावक पाय,
हमारा हीरसूरि गुरुराय

…हमारा.१

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झुँझलायें नहीं

झुँझलायें नहीं

थोवं लद्धुं न खिंसए

थोड़ा मिलने पर झुँझलाएँ नहीं

यदि पूछा जाये कि ‘कुछ न मिलना’ अच्छा है या ‘कुछ मिलना’ तो यही उत्तर मिलेगा कि कुछ मिलना अच्छा है; परन्तु कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो टुकड़ों में या खण्डशः कोई वस्तु लेना पसन्द नहीं करते| वे पूर्ण वस्तु पाना चाहते हैं; इसलिए अपूर्ण वस्तु की प्राप्ति पर अप्रसन्न होते हैं| Continue reading “झुँझलायें नहीं” »

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सम्यग्दर्शी

सम्यग्दर्शी

सम्मत्तदंसी न करेइ पावं

सम्यग्दर्शी पाप नहीं करता

जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, बन्ध, निर्जरा और मोक्ष – ये नौ ‘तत्त्व’ हैं| इनका स्वरूप अर्थ है| तत्त्व और अर्थ पर श्रद्धा रखना ही सम्यग्दर्शन है; क्यों कि जो साधक तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप को समझ लेता है, उसका उनके प्रति विश्‍वास हो ही जाता है| Continue reading “सम्यग्दर्शी” »

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क्रोध न करें

क्रोध न करें

वुच्चमाणो न संजले

साधक को कोई यदि दुर्वचन कहे; तो भी वह उस पर क्रोध न करे

मनुष्य से जाने-अनजाने भूलें होती ही रहती हैं| अपनी भूलें स्वयं अपने को मालूम नहीं होतीं; इसीलिए “गुरुदेव” की जीवन में आवश्यकता होती है| वे दयावश हमें सुधारने के लिए हमारी भूलें बताते हैं| यदि हम उनके निर्देश के अनुसार विनयपूर्वक एक-एक भूल को सुधारते रहें; तो क्रमशः हमारा जीवन शुद्ध से शुद्धतर होता चला जाये| Continue reading “क्रोध न करें” »

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परिवार की दृष्टि से न गिरो

परिवार की दृष्टि से न गिरो
कई बेसमझ अज्ञान महिलाएँ अपने भर्तार और घर की आय-व्यय का विचार न कर, वे विशेष वस्त्रालंकार श्रृंगार की वस्तुओं के लिये मरती हैं, कलह कर बैठती हैं| इसी मनमुटाव के कारण वे शनै: शनै: अपने परिवार और समाज की दृष्टि से गिर जाती हैं| Continue reading “परिवार की दृष्टि से न गिरो” »

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Quote #2

The reward of our work is not what we get, but what we become.
Unknown
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शंका हो तो न बोलें

शंका हो तो न बोलें

जत्थ संका भवे तं तु,
एवमेयं ति नो वए

जिस विषय में अपने को शंका हो, उस विषय में ‘‘यह ऐसी ही है’’ ऐसी भाषा न बोलें

शंका एक ऐसी मनोवृत्ति है, जो हमें अपने अल्पज्ञान या अज्ञान का भान कराती रहती है| अज्ञान के भान से हमें लज्जा आती है और एक प्रकार का मानसिक कष्ट होता है| शास्त्रज्ञान के लिए जब हम आचार्यों या गुरुओं की उपासना करते हैं; तब भी उनके कठोर शब्दों का प्रहार हमें सहना पड़ता है| Continue reading “शंका हो तो न बोलें” »

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सम्प्रति महाराज

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बुद्धिवाद

बुद्धिवाद

पा समिक्खए धम्मं

बुद्धि ही धर्म का निर्णय कर सकती है

महावीर ही थे, जिन्होंने ढाई-हजार वर्ष पहले इस सूक्ति के द्वारा बुद्धिप्रामाण्यवादका डिण्डिम घोष किया था| Continue reading “बुद्धिवाद” »

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