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Motivational Wallpaper #14

A friend is one of the nicest things you can have & one of the best things you can be

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सद्गुरु की शरण

सद्गुरु की शरण

सद्गुरुः शरणं मम
यह संसार जन्म, मरण, रोग, शोक, व्याधि और उपाधि के कारण महा दुःखमय है| ऐसे दुःखमय संसार में सार तो कुछ भी नहीं है और सुख भी कहीं नहीं है…| Continue reading “सद्गुरु की शरण” »

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श्री हेमचंद्राचार्य

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Follow Lord Mahaveer’s teachings…they can save your life

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निर्लिप्तता और स्वावलम्बन

निर्लिप्तता और स्वावलम्बन

पोक्खरपत्तं इव निरुवलेवे,
आगासं चेव निरवलंबे

साधक को कमलपत्र की तरह निर्लेप और आकाश की तरह निरवलम्ब रहना चाहिये

कमल पानी में उत्प होता है और उसीमें रहता है; किन्तु उसके किसी भी पत्ते पर पानी की बूँद नहीं ठहरती, नहीं चिपकती| जिस प्रकार कमलपत्र पानी में रहकर भी पानी से निर्लिप्त रहता है, उसी प्रकार साधु भी संसार में रहते हुए भी उससे सर्वथा निर्लिप्त रहता है – अनासक्त रहता है| Continue reading “निर्लिप्तता और स्वावलम्बन” »

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सदा जागृत

सदा जागृत

सुत्ता अमुणी, मुणीणो सया जागरंति

जो सुप्त हैं, वे अमुनि है मुनि तो सदा जागते रहते हैं

जो अमुनि हैं-असाधु हैं; जिनमें साधुता या साधकता का अभाव है, वे आलसी लोग सोते रहते हैं| जो सोते हैं, उनकी आँखें बन्द रहती हैं और उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता| इसी प्रकार जो असाधु हैं; उनके विवेक – चक्षु बन्द रहते हैं और इसीलिए उन्हें अपने कर्त्तव्य अकर्त्तव्य का भान नहीं रहता| वे किंकर्त्तव्यविमूढ़ बने रहते हैं| Continue reading “सदा जागृत” »

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आत्मा का स्वाभाविक धर्म – सम्यक्त्व

आत्मा का स्वाभाविक धर्म   सम्यक्त्व
सम्यक्त्व का अर्थ है, निर्मल दृष्टि, सच्ची श्रद्धा और सच्ची लगन| सम्यक्त्व ही मुक्ति-मार्ग की प्रथम सीढ़ी है| जब तक सम्यक्त्व नहीं है, तब तक समस्त ज्ञान और चारित्र मिथ्या है| जैसे अंक के बिना बिन्दुओं की लम्बी लकीर बना देने पर भी, उसका कोई अर्थ नहीं होता, उससे कोई संख्या तैयार नहीं होती, उसी प्रकार समकित के बिना ज्ञान और चारित्र का कोई उपयोग नहीं, वे शून्यवत् निष्फल है| अगर सम्यक्त्व रूपी अंक हो और उसके बाद ज्ञान और क्रिया (चारित्र) हो तो जैसे एक के अंक पर प्रत्येक शून्य से दस गुनी कीमत हो जाती है, वैसे ही ज्ञान और चारित्र-दान, शील, तप-जप आदि मोक्ष के साधक होते हैं| मुक्ति के लिये सम्यग्दर्शन की सर्वप्रथम अपेक्षा रहती है| Continue reading “आत्मा का स्वाभाविक धर्म – सम्यक्त्व” »

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श्री पुण्डरिक स्वामी की चरण पादुकाएँ

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सदा अमूढ़

सदा अमूढ़

सम्मद्दिट्ठि सया अमूढे

जिसकी दृष्टि सम्यक् है, वह सदा अमूढ़ होता है

मिथ्याद्दष्टि मूढ़ होता है; उसकी मूढ़ता सत्संग से मिट सकती है; किंतु सम्यग्द्दष्टि अमूढ़ होता है, उसकी अमूढ़ता कुसंगति से भी नहीं मिटती| Continue reading “सदा अमूढ़” »

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