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श्री अजितनाथजी की चरण पादुकाएँ

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अतिवेल न बोलें

अतिवेल न बोलें

नाइवेलं वएज्जा

अधिक समय तक एवं अमर्याद न बोलें

‘वेला’ का अर्थ समय भी होता है और मर्यादा भी; इसलिए इस सूक्ति के दो अर्थ होते हैं| Continue reading “अतिवेल न बोलें” »

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श्री सीमंधर स्वामी, मुक्तिना गामी

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श्री सीमंधर स्वामी जिन स्तवन
राग : माढ.., नेमि जिन प्यारा…

श्री सीमंधर स्वामी, मुक्तिना गामी, दीठे परमानंद,
प्रभु सुमति आपो, कुमति कापो, टाळो भवभयङ्गंद,
कर्म अरिगण दूर करीने,
तोडो भवतरू कंद रे.

…सीमंधर.१

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गुरुदेवश्री का आश्‍वासन

गुरुदेवश्री का आश्‍वासन
अरे पुण्यशाली मानव! तू वास्तव में धन्यवाद का पात्र है| पाप हो जाना, कोई आश्‍चर्य नहीं है| मोहनीय कर्म के उदय से किसने कौन-से पाप नहीं किये? क्या मोह ने तीर्थंकर की आत्मा को भी छोड़ा है? क्या उन्होंने अपने पूर्व जीवन में भयंकर पाप नहीं किये? क्या उन पापों से उन्हें सातवी नरक तक नहीं जाना पड़ा? परंतु जीवन की काली-श्याम किताब को धोकर तुझे उज्जवल बनने का मनोरथ हुआ हैं| अतः तू धन्यवाद का पात्र है| तू तो काली किताब का एक-एक पन्ना खोलकर कालिमा को धो रहा है| अतः तू विशेष रूप से धन्यवाद का पात्र है| बालक जैसी सरलता से एक एक पाप निष्कपट भाव से प्रगट कर दे| अरे! आत्मा पर से झिड़क दे इन पापों को| Continue reading “गुरुदेवश्री का आश्‍वासन” »

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निष्प्रयोजन हिंसा

निष्प्रयोजन हिंसा

अट्ठा हणंति, अणट्ठा हणंति

कुछ लोग प्रयोजन से हिंसा करते हैं और कुछ लोग बिना प्रयोजन ही

बहुत-से लोगों की यह आदत होती है कि यों ही चलते-चलते रास्ते में आये किसी पौधे को उखाड़ कर फैंक देते हैं – फूल को तोड़ कर मसल देते हैं – पेड़ की टहनी तोड़ कर हाथ में रख लेते हैं और कुछ दूर जाकर फैंक देते हैं| बहुत-सी महिलाएँ ऐसी होती हैं कि यों ही खड़ी-खड़ी अपने पॉंव के अंगूठे से जमीन कुरेदती रहती हैं| Continue reading “निष्प्रयोजन हिंसा” »

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अनुभव ! हम तो रावरी दासी

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अनुभव ! हम तो रावरी दासी,
आइ कहातें माया ममता,जानुं न कहां की वासी?

…१

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दर्शनावरणीय कर्म

दर्शनावरणीय कर्म
आँखों से देखने की शक्ति कम करता हैं,
कानों से सुनने की शक्ति कम करता हैं, Continue reading “दर्शनावरणीय कर्म” »

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प्रमाद मत कर

प्रमाद मत कर

समयं गोयम ! मा पमायए

हे गौतम! तू क्षण भर के लिए भी प्रमाद मत कर

गौतमस्वामी को, जो महावीर स्वामी के प्रधान शिष्य थे – प्रधान गणधर थे, यह प्रेरणा दी गई थी कि आत्मकल्याण के मार्ग में चलते हुए क्षण भर के लिए भी तू प्रमाद मत कर| Continue reading “प्रमाद मत कर” »

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बीच में न बोलें

बीच में न बोलें

राइणियस्स भासमाणस्स वा
वियागरेमाणस्स वा नो अन्तरा भासं भासिज्ज

अपने से बड़े गुरुजन (रत्नाधिक) जब बोलते हों – व्याख्यान करते हों, तब उनके बीच में नहीं बोलना चाहिये

सद्गुण ही वास्तव में रत्न हैं, चमकीले पत्थर नहीं| जो व्यक्ति अपने से अधिक गुणवान है, उसके लिए रत्नाधिक शब्द का प्रयोग शास्त्रों में आता है| रत्नाधिक गुरुजन जब बोल रहे हों, चर्चा कर रहे हों अथवा व्याख्यान कर रहे हों, तब विनीत शिष्य का कर्त्तव्य है कि वह उनके बीच-बीच में न बोले| Continue reading “बीच में न बोलें” »

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मित्रों का नाशक

मित्रों का नाशक

माया मित्ताणि नासेइ

माया मित्रता को नष्ट करती है

माया शब्द का अर्थ यहॉं कपट या छल है| जिस प्रकार क्रोध प्रीति का और मान विनय का नाशक है, उसी प्रकार छल भी मित्रों का नाशक है| Continue reading “मित्रों का नाशक” »

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