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जनक सुता हुं नाम

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भाव : महासती सीतानो रावणने पडकार ने शील दृढता

जनक सुता हुं नाम धरावुं,
राम छे अंतर जामी;
पालव मारो मेलोने पापी,
कुळने लागे छे खामी.
अडशो मांजो, मांजो मांजो मांजो मांजो अडशो,
म्हारो नावलीयो दुहवाय,
मने संग केनो न सुहाय;
म्हारुं मन मांहेथी अकळाय.

…अ.१

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Quote #10

Technology without Humanity is insanity.
Unknown
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स्नेह और तृष्णा

स्नेह और तृष्णा

वीयरागयाएणं नेहाणुबंधणाणि,
तण्हाणुबंधणाणि य वोच्छिन्दइ

वीतरागता से स्नेह औ तृष्णा के बन्धन कट जाते हैं

द्वेष दुर्गुण है – त्याज्य है| द्वेष का विरोधी राग है; फिर भी राग एक दुर्गुण है और वह भी द्वेष की तरह ही त्याज्य है| Continue reading “स्नेह और तृष्णा” »

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वाणी के गुण

वाणी के गुण

मियं अदुट्ठं अणुवीइ भासए,
सयाण मज्झे लहइ पसंसणं

जो विचारपूर्वक परिमित और निर्दोष वचन बोलता है, वह सज्जनों के बीच प्रशंसा पाता है

बोलते सब हैं, किन्तु ऐसे कितने व्यक्ति हैं, जो वास्तव में बोलना जानते हैं? Continue reading “वाणी के गुण” »

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सच्चाई को जानिये

सच्चाई को जानिये

पुरिसा! सच्चमेव समभिजाणाहि

हे पुरुष! तू सत्य को ही अच्छी तरह जान ले

दुनिया में जानने योग्य बहुत-सी बातें हैं| भूगोल, खगोल, भूगर्भ, गणित, इतिहास, भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र, कोष, व्याकरण, छन्द, काव्य, अलंकार, रस, ललितकलाएँ, ज्योतिष, सामुद्रिक, शकुन, साहित्य विभभिन्न देशों की विभिन्न भाषाएँ, विविध लिपियॉं, संगीतशास्त्र, नीति, दर्शन, न्याय आदि सैकड़ों विषय हैं| Continue reading “सच्चाई को जानिये” »

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नाथ कहे तुं सुणने नारी

Listen to नाथ कहे तुं सुणने नारी

भाव : नारी ने नारायणी बनावती हितशिक्षा

नाथ कहे तुं सुणने नारी, शिखामण छे सारी जी;
वचन ते सघळां वीणी लेशे, तेहना कारज सरशे, शाणी थइए ज.

…1

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नि: स्वार्थ सेवा सच्चा दान है

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Motivational Wallpaper #40

व्यक्ति वैसा ही होता है,
जैसी इच्छा ह्रदय में रखता है

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800×600 1280×720 iPhone
1024×768 1280×800 iPad
1400×1050 1440×900
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आलोचना का प्रायश्चित्त किसे दिया जाए?

आलोचना का प्रायश्चित्त किसे दिया जाए?

न हु सुज्झइ ससल्लो जह
भणियं सासणे धुयरयाणं|
उद्धरियसव्वसल्लो सुज्झइ जीवो धुयकिलेसे॥

कर्मरज जिन्होंने दूर कर दी है, ऐेसे परमात्मा के शासन में कहा गया है कि शल्य (छिपाए हुए पाप) सहित कोई भी जीव शुद्ध नहीं होता है| क्लेश रहित बनकर सभी शल्यों को दूर करके ही जीव शुद्ध बनता है| अतः शुद्ध होने के लिए आलोचना अवश्य कहनी चाहिए| Continue reading “आलोचना का प्रायश्चित्त किसे दिया जाए?” »

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