जीवा सोहिमणुप्पत्ता, आययन्ति मणुस्सयं
सांसारिक जीव क्रमशः शुद्ध होते हुए मनुष्यभव पाते हैं
सांसारिक जीव क्रमशः शुद्ध होते हुए मनुष्यभव पाते हैं
साधक को कमलपत्र की तरह निर्लेप और आकाश की तरह निरवलम्ब रहना चाहिये
जो सुप्त हैं, वे अमुनि है मुनि तो सदा जागते रहते हैं
जिसकी दृष्टि सम्यक् है, वह सदा अमूढ़ होता है
विग्रह बढ़ानेवाली बात नहीं करनी चाहिये
जो अति मात्रा में अ-जल ग्रहण नहीं करता, वही निर्ग्रन्थ है
सत्य ही भगवान है
जो अनन्यदर्शी होता है, वह अनन्याराम होता है और जो अनन्याराम होता है, वह अनन्यदर्शी होता है
जो एक को जानता है, वह सबको जानता है और जो सबको जानता है, वह एक को जानता है
जिसे आत्मस्वरूप का सम्यग्ज्ञान हो जाता है, वह अनात्मतत्त्वों में रमण नहीं करता; क्यों कि वह आत्मभि पदार्थों के स्वरूप को – उनकी क्षणिकताको भी जान लेता है| Continue reading “एकज्ञ-सर्वज्ञ” »