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निन्दक भटकता है

निन्दक भटकता है

जो परिभवइ परं जणं,
संसारे परिवत्तई महं

जो दूसरे मनुष्य का परिभव (तिरस्कार) करता है, वह संसार में भटकता रहता है

सब मनुष्य एक से एक बढ़कर हैं| कोई इससे बड़ा है तो कोई उससे-कोई अमुक गुण में महान है तो कोई अमुक गुण में; इसलिए कभी किसी को अपने से तुच्छ मानने की भूल नहीं करनी चाहिये| Continue reading “निन्दक भटकता है” »

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भक्तामर स्तोत्र – श्लोक 6

भक्तामर स्तोत्र   श्लोक 6

अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम
त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम् |
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति
तच्चारु – चूत – कलिका – निकरैकहेतुः ||5||

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कठोर वाणी न बोलें

कठोर वाणी न बोलें

नो वयणं फरूसं वइज्जा

वाणी भी दो तरह की होती है – कठोर और कोमल| क्रोध और क्रूरता में वाणी कठोर निकलती है तथा विनय और शान्ति में कोमल | करुणा, दया, सहानुभूति, प्रेम, ममता, मोह, स्नेह और माया की वाणी कोमल होती है| इसके विपरीत निष्ठुरता, निर्दयता, द्वेष, क्रोध आदि में वाणी कठोर निकलती है| Continue reading “कठोर वाणी न बोलें” »

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सन्तोषी पाप नहीं करते

सन्तोषी पाप नहीं करते

सन्तोसिणो नो पकरेंति पावं

सन्तोषी पाप नहीं करते

लोभ पाप का मूल कारण है| ज्यों-ज्यों व्यक्ति लाभान्वित होता जाता है, त्यों-त्यों वह अधिक से अधिक पापमार्ग में प्रवृत होता जाता है; क्यों कि लाभ के अनुपात में उसका लोभ बढ़ता रहता है, जो अनुचित एवं अन्यायपूर्ण कार्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करता रहता है| Continue reading “सन्तोषी पाप नहीं करते” »

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हिंसा न करें

हिंसा न करें

सव्वेसिं जीवियं पियं,
नाइवाएज्ज कंचणं

सबको जीवन प्रिय है, किसीके प्राणों का अतिपात नहीं चाहिये

कौन प्राणी है, जो जीवित रहना नहीं चाहता? अपना-अपना जीवन सभीको प्यारा लगता है| मनुष्य का जीवन कितना मूल्यवान् है – इसका पता तब लगता है, जब उसके सामने एक ओर करोड़ों स्वर्णमुद्राओं के साथ उसकी मृत्यु तथा दूसरी ओर साधारण अबल के साथ उसका जीवन रखकर इनमें से किसी एक का चयन करने के लिए उसे कहा जाये| Continue reading “हिंसा न करें” »

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सिंह-सी निर्भयता

सिंह सी निर्भयता

सीहो व सद्देण न संतसेज्जा

सिंह के समान निर्भीक; केवल शब्दों से न डरिये

सिंह कितना निर्भय होता है! हाथी की चिंघाड़ से भी वह नहीं डरता| यद्यापि हाथी के शरीर से उसका शरीर बहुत छोटा होता है; फिर भी उसकी साहसिकता – उसकी वीरता उसमें प्रशंसनीय निर्भयता के भाव जगा देती है, जिससे कि वह चिंघाड़ के प्रति भी लापरवाह बन जाता है| इसी प्रकार वीर पुरुष भी शत्रुओं की ललकार से नहीं डरते; जो डर जाते हैं, वे वीर नहीं कायर हैं| Continue reading “सिंह-सी निर्भयता” »

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यथावादी तथाकारी

यथावादी तथाकारी

करणसच्चे वट्टमाणे जीवे
जहावाई तहाकारी या वि भवइ

करणसत्य में रहनेवाला जीव जैसा बोलता है, वैसा ही करता है

जो कभी पाप न स्वयं करता है, न दूसरों से कराता है और न किसी पापी के कार्यों का अनुमोदन ही करता है, वह करण सत्य में रहनेवाला जीव है| ऐसे सज्जन व्यक्ति का व्यवहार शुद्ध और सच्चा होता है| उसके मन-वचन और काया के व्यापारों में एकता होती है| Continue reading “यथावादी तथाकारी” »

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स्नेह और तृष्णा

स्नेह और तृष्णा

वीयरागयाएणं नेहाणुबंधणाणि,
तण्हाणुबंधणाणि य वोच्छिन्दइ

वीतरागता से स्नेह औ तृष्णा के बन्धन कट जाते हैं

द्वेष दुर्गुण है – त्याज्य है| द्वेष का विरोधी राग है; फिर भी राग एक दुर्गुण है और वह भी द्वेष की तरह ही त्याज्य है| Continue reading “स्नेह और तृष्णा” »

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वाणी के गुण

वाणी के गुण

मियं अदुट्ठं अणुवीइ भासए,
सयाण मज्झे लहइ पसंसणं

जो विचारपूर्वक परिमित और निर्दोष वचन बोलता है, वह सज्जनों के बीच प्रशंसा पाता है

बोलते सब हैं, किन्तु ऐसे कितने व्यक्ति हैं, जो वास्तव में बोलना जानते हैं? Continue reading “वाणी के गुण” »

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