राइणियस्स भासमाणस्स वा
वियागरेमाणस्स वा नो अन्तरा भासं भासिज्ज
वियागरेमाणस्स वा नो अन्तरा भासं भासिज्ज
अपने से बड़े गुरुजन (रत्नाधिक) जब बोलते हों – व्याख्यान करते हों, तब उनके बीच में नहीं बोलना चाहिये
अपने से बड़े गुरुजन (रत्नाधिक) जब बोलते हों – व्याख्यान करते हों, तब उनके बीच में नहीं बोलना चाहिये
माया मित्रता को नष्ट करती है
जिसमें लोभ नहीं होता, उसकी तृष्णा नष्ट हो जाती है और जो अकिंचन है, उसका लोभ नष्ट हो जाता है
वैडूर्यरत्न के समान चमकने वाले काच के टुकडे का, जानकारों के समक्ष कुछ भी मूल्य नहीं है
लोभ से कलुषित जीव अदत्तादान (चोरी) करता है
मुनि कभी मर्यादा से अधिक न हँसे
सन्मार्ग का तिरस्कार करके अल्प सुख (विषयसुख) के लिए अनन्त सुख (मोक्षसुख) का विनाश मत कीजिये
धीर पुरुष क्रिया में रुचिवाला होता है
भोगी संसार में भटकता है और अभोगी मुक्त हो जाता है
जिसके आगे-पीछे न हो, उसके बीच में भी कैसे होगा?