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अनाथ नाथ नहीं हो सकता
अप्पणा अनाहो सन्तो,
कहं नाहो भविस्ससि?
कहं नाहो भविस्ससि?
तू स्वयं अनाथ है, तो फिर तू दूसरे का नाथ कैसे हो सकता है ?
प्रियकर प्रियवादी
पियंकरे पियंवाइ, से सिक्खं लद्धुमरिहइ
प्रिय करनेवाला और प्रिय बोलनेवाला अपनी शिक्षा प्राप्त करने में समर्थ होता है
धन हो या न हो
धणेण किं धम्मधुराहिगारे ?
धर्मधुरा खींचने के लिए धन की क्या आवश्यकता है? वहॉं तो सदाचार ही आवश्यक है
दुष्कर कुछ नहीं
इह लोए निप्पिवासस्स,
नत्थि किंचि वि दुक्करं
नत्थि किंचि वि दुक्करं
इस संसार में जो निःस्पृह है, उसके लिए कुछ भी दुष्कर नहीं है
दुर्गति की दिशा में
आसुरीयं दिसं बाला, गच्छंति अवसा तमं
अज्ञ जीव विवश होकर अन्धकाराच्छदन
आसुरी गति को प्राप्त होते हैं
बात लम्बी न करें
निरुद्धगं वा वि न दीहइज्जा
थोड़े में कही जानेवाली बात को व्यर्थ ही लम्बी न करें
सोचकर बोलें
अणुचिंतिय वियागरे
सोचकर बोलें
क्रोध का नाश
उवसमेण हणे कोहं
क्रोध को शान्ति से नष्ट करें
लोभ को छोड़िये
लोभमलोभेण दुगंछमाणे
लद्धे कामे नाभिगाहइ
लद्धे कामे नाभिगाहइ
लोभ को अलोभ से तिरस्कृत करनेवाला साधक प्राप्त कामों का भी सेवन नहीं करता

















