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प्राणवध कैसा है?
पाणवहो चंडो रुद्दो, खुद्दो, अणारियो,
निग्धिणो, निसंसो, महब्भभओ
निग्धिणो, निसंसो, महब्भभओ
प्राणवध चण्ड है, रौद्र है, क्षुद्र है, अनार्य है, करुणारहित है, क्रूर है, भयंकर है
मैं अकेला हूँ
एगे अहमसि, न मे अत्थि कोई,
न वाऽहमवि कस्स वि
न वाऽहमवि कस्स वि
मैं अकेला हूँ – मेरा कोई नहीं है और मैं भी किसी का नहीं हूँ
मैं अन्य हूँ
ए खलु कामभोगा, ओ अहमसि
कामभोग अन्य हैं, मैं अन्य हूँ
भक्तामर स्तोत्र – श्लोक 6
अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम
त्वद्भक्तिरेव मुखरीकुरुते बलान्माम् |
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति
तच्चारु – चूत – कलिका – निकरैकहेतुः ||5||
मूर्च्छा ही परिग्रह है
मुच्छा परिग्गहो वुत्तो
मूर्च्छा को ही परिग्रह कहा गया है
निन्दक भटकता है
जो परिभवइ परं जणं,
संसारे परिवत्तई महं
संसारे परिवत्तई महं
जो दूसरे मनुष्य का परिभव (तिरस्कार) करता है, वह संसार में भटकता रहता है
कठोर वाणी न बोलें
नो वयणं फरूसं वइज्जा
वाणी भी दो तरह की होती है – कठोर और कोमल| क्रोध और क्रूरता में वाणी कठोर निकलती है तथा विनय और शान्ति में कोमल | करुणा, दया, सहानुभूति, प्रेम, ममता, मोह, स्नेह और माया की वाणी कोमल होती है| इसके विपरीत निष्ठुरता, निर्दयता, द्वेष, क्रोध आदि में वाणी कठोर निकलती है| Continue reading “कठोर वाणी न बोलें” »
सन्तोषी पाप नहीं करते
सन्तोसिणो नो पकरेंति पावं
सन्तोषी पाप नहीं करते

















