लोभाविले आययइ अदत्तं
लोभ से कलुषित जीव अदत्तादान (चोरी) करता है
लोभ से कलुषित जीव अदत्तादान (चोरी) करता है
मुनि कभी मर्यादा से अधिक न हँसे
सन्मार्ग का तिरस्कार करके अल्प सुख (विषयसुख) के लिए अनन्त सुख (मोक्षसुख) का विनाश मत कीजिये
धीर पुरुष क्रिया में रुचिवाला होता है
भोगी संसार में भटकता है और अभोगी मुक्त हो जाता है
जिसके आगे-पीछे न हो, उसके बीच में भी कैसे होगा?
आत्महितैषी साधक अपने को विनय में स्थिर करे
Sorry, this article is only available in English. Please, check back soon. Alternatively you can subscribe at the bottom of the page to recieve updates whenever we add a hindi version of this article.
हे पुरुष ! तू स्वयं ही अपना मित्र है| अन्य बाहर के मित्रों की चाह क्यों रखता है ?
सांसारिक जीव क्रमशः शुद्ध होते हुए मनुष्यभव पाते हैं