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पाप न करें, न करायें

पाप न करें, न करायें

पावकम्मं नेव कुज्जा न कारवेज्जा

पापकर्म न स्वयं करना चाहिये और न दूसरों से कराना चाहिये

पुण्य का फल सुख है और पाप का फल दुःख | सुख सब चाहते हैं, फिर भी पुण्य करने में आलसी बनते हैं और दुःख कोई नहीं चाहता, फिर भी सावधानी पूर्वक दुःख के कारणों का अर्थात् पापों का सेवन करते हैं| कैसी विचित्र बात है यह? Continue reading “पाप न करें, न करायें” »

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मूर्ख की संगति न करें

मूर्ख की संगति न करें

अलं बालस्स संगेणं

बाल (अज्ञानी या मूर्ख) की संगति नहीं करनी चाहिये

यह एक अनुभूत तथ्य है कि साथ रहनेवालों पर परस्पर एक-दूसरे का प्रभाव पड़ता है| यदि साथी व्यसनी होगा; तो हम भी व्यसनी बन जायेंगे – यदि वह बुद्धिमान होगा तो हमें भी बुद्धिमान बना देगा – यदि वह विद्वान होगा तो हमें भी विद्वान बनने के लिए प्रेरित करेगा| Continue reading “मूर्ख की संगति न करें” »

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विचारपूर्वक बोलें

विचारपूर्वक बोलें

अणुवीइभासी से निग्गंथे

जो विचारपूर्वक बोलता है, वही निर्ग्रन्थ है

बोली से या बातचीत से ही पता लगता है कि कौन मूर्ख है और कौन विद्वान| दोनों में अन्तर क्या है? Continue reading “विचारपूर्वक बोलें” »

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आत्मवत् देखो

आत्मवत् देखो

आयओ बहिया पास

अपने समान ही बाहर (दूसरों को) देख

ज्ञानियों ने पापों से – सब प्रकार के दुराचरणों से बचने का एक अत्यन्त सरल उपाय सुझाया है, जिसके द्वारा हम पुण्य-पाप का-अहिंसा-हिंसाका-धर्माधर्म का निर्णय भी कर सकते हैं और बुराइयों से बच भी सकते हैं| Continue reading “आत्मवत् देखो” »

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विचार वैभिन्य

विचार वैभिन्य

पुढो छंदा इह मानवा

यहॉं मनुष्य विभिन्न रुचियों वाले हैं

इस संसार में हम देखते हैं कि मनुष्यों का परस्पर स्वभाव भिन्न-भिन्न होता है – उनकी रुचियॉं भिन्न-भिन्न होती हैं – उनके विचार भिन्न-भिन्न होते हैं| यहॉं तक कि एक ही मनुष्य के विचार भी समान नहीं रहते-विभिन्न समयों में विभिन्न होते हैं| Continue reading “विचार वैभिन्य” »

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भूल दुहराऊँगा नहीं !

भूल दुहराऊँगा नहीं !

तं परिण्णाय मेहावी, इयाणिं णो,
जमहं पुव्वमकासो पमाएणं

मेधावी साधक को आत्मपरिज्ञान के द्वारा यह निश्‍चय करना चाहिये कि मैंने पूर्वजीवन में प्रमादवश जो कुछ भूल की है, उसे अब कभी नहीं करूँगा

कहते हैं, व्यक्ति ठोकरों से ही सीखता है| प्रत्येक ठोकर उसे कुछ-न-कुछ शिक्षा दे जाती है – सिखा जाती है; परन्तु उस शिक्षा को ग्रहण करना या न करना व्यक्ति की अपनी इच्छा पर निर्भर है| जो मेधासम्प है – बुद्धिमान है, उसीमें ऐसी इच्छा की उत्पत्ति और निवास सम्भव है| Continue reading “भूल दुहराऊँगा नहीं !” »

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समान भाव रहें

समान भाव रहें

जहा पुण्णस्स कत्थई, तहा तुच्छस्स कत्थई|
जहा तुच्छस्स कत्थई, तहा पुण्णस्स कत्थई|

जैसे पुण्यवान को कहा जाता है, वैसे ही तुच्छ को और जैसे तुच्छ को कहा जाता है, वैसे ही पुण्यवान को

निःस्पृह उपदेशक जैसा उपदेश धनवान को देता है, वैसा ही दरिद्र को भी देता है और जैसा उपदेश दरिद्र को देता है, वैसा ही धनवान को भी देता है| मतलब यह कि उसकी दृष्टि में अमीर-गरीब का कोई भेदभाव नहीं रहता| वह सबको समान उपदेश देता है| Continue reading “समान भाव रहें” »

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विनय

विनय

जे एगं नाम से बहुं नामे

जो एक अपने को नमा लेता है; वह बहुतों को नमा लेता है

यदि हम चाहते हैं कि दूसरे लोग हमारा विनय करें; तो हमें भी दूसरों का विनय करना चाहिये| जो घमण्ड करता है, वह सबसे घृणा पाता है – उसे कहीं भी आदर नहीं मिल सकता| Continue reading “विनय” »

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बन्धनमुक्त करें

बन्धनमुक्त करें

एस वीरे पसंसिए, जे बद्धे पडिमोयए

वही वीर प्रशंसनीय बनता है, जो बद्ध को प्रतिमुक्त करता है

तलवार से मनुष्य अपने हाथ-पॉंव भी काट सकता है और दूसरों के बन्धन भी – हाथों से वह दूसरों को तमाचे भी मार सकता है और उनकी सहायता भी कर सकता है| इसी प्रकार उसमें जो शक्ति है, उसका वह सदुपयोग भी कर सकता है और दुरुपयोग भी | शक्ति भी तलवार की तरह एक हथियार है – एक साधन है| प्रशंसा और निन्दा दोनों उससे प्राप्त की जा सकती हैं| Continue reading “बन्धनमुक्त करें” »

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आतङ्कदर्शी

आतङ्कदर्शी

आयंकदंसी न करेइ पावं

आतंकदर्शी पाप नहीं करता

संसार में ऐसा कौन प्राणी है, जो दुःखी न हो? कोई न कोई दुःख प्रत्येक जीव के पीछे लगा ही रहता है| जन्म का, मृत्यु का और बुढ़ापे के दुःख तो अनिवार्य है ही; जिस का सबको अनुभव करना पड़ता है; परन्तु इसके अतिरिक्त रोग, शोक, वियोग, अपमान, चोट, जलन, कटु शब्द, करूपता, दुर्गन्ध, बेस्वाद भोजन, कठोर स्पर्श, बन्धन, निर्धनता, तिरस्कार, मालिक की फटकार, दौड़धूप आदि सैकड़ों दुःख हैं; जिनसे प्राणी निरन्तर कष्ट पा रहे हैं, व्याकुलता का अनुभव कर रहे हैं, छटपटा रहे हैं| Continue reading “आतङ्कदर्शी” »

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