सम्मत्तदंसी न करेइ पावं
सम्यग्दर्शी पाप नहीं करता
सम्यग्दर्शी पाप नहीं करता
जो अभ्यन्तर को जानता है, वह बाह्य को जानता है और जो बाह्य को जानता है वह अभ्यन्तर को जानता है
कामभोगों में आसक्त रहनेवाले व्यक्ति कर्मों का बन्धन करते हैं
जो मेधावी सत्य की आज्ञा में उपस्थित रहता है, वह मृत्यु के प्रवाह को तैर जाता है
लोभ का प्रसंग आने पर लोभी झूठ बोलने लगता है
जो जन (कामनाओं को) पार कर गये हैं, वे सचमुच ही मुक्त हैं
कुशल पुरुष न बद्ध होता है, न मुक्त
मोहग्रस्त व्यक्ति न इस पार रहते हैं, न उस पार
यह जीव अनेक बार उच्च गोत्रमें और अनेक बार नीच गोत्र में जन्म ले चुका है; परन्तु इससे न कोई हीन होता है, न महान|
वृद्ध होने पर व्यक्ति न हास-परिहास के योग्य रहता है, न क्रीड़ा के, न रति के और न शृंगार के ही