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उत्तम तप

उत्तम तप

तवेसु वा उत्तमं बंभचेरं

ब्रह्मचर्य तपों में उत्तम है

परमार्थ के लिए या आत्मकल्याण के लिए जो विविध कष्टों में सहिष्णुता का परिचय दिया जाता है, वही तपस्या है| शास्त्रों में दो प्रकार की तपस्या का वर्णन आता है – बाह्य तप और अभ्यन्तर तप| अनशन, ऊनोदरी, वृत्तिसंक्षेप, रसपरित्याग, कायक्लेश और प्रतिसंलीनता – ये छः बाह्यतप हैं और प्रायश्‍चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान एवं कायोत्सर्ग ये छः अभ्यन्तर तप| साधक दोनों प्रकार के तप करता है| Continue reading “उत्तम तप” »

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Wallpaper #5

The soul comes alone and goes alone, no one companies it and no one becomes its mate

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सुव्रत की सद्गति

सुव्रत की सद्गति

भिक्खाए वा गिहत्थे वा,
सुव्वह गम्मई दिवं

चाहे भिक्षुक हो, चाहे गृहस्थ; जो सुव्रत है, वह स्वर्ग पाता है

यह आवश्यक नहीं है कि जो गृहस्थ है, वह सद्गति न पाये अथवा जो गृहत्यागी है, वह सद्गति अवश्य पाये| Continue reading “सुव्रत की सद्गति” »

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चार संयम

चार संयम

चउव्विहे संजमे – मणसंजमे,
वइसंजमे, कायसंजमे, उवगरणसंजमे

मनसंयम, वचनसंयम, शरीरसंयम और उपकरणसंयम – ये संयम के चार प्रकार हैं

समुद्र जिस प्रकार अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, उसी प्रकार साधुसन्त भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ते| संयम का पालन करना ही उनकी मर्यादा है| Continue reading “चार संयम” »

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भारतीय शास्त्रीय संगीत और उसके वैज्ञानिक महत्व

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श्री सिद्धगिरिराज की यात्रा में करने के पाँच चैत्यवंदन

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शूरम्मन्य

शूरम्मन्य

सूरं मण्णइ अप्पाणं,
जाव जेयं न पस्सति

व्यक्ति तभी तक अपने को शूरवीर मानता है, जब तक विजेता को नहीं देख लेता

दुनिया में एक से बढ़कर एक लोग चारों ओर भरे पड़े हैं| कोई रूप में बड़ा है, कोई विद्या में – कोई धन में बड़ा है तो कोई शक्ति में|

शक्ति में भी कोई लाखों से बड़ा है; तो हजारों से छोटा भी हो सकता है; क्यों कि दुनिया बहुत बड़ी है| प्रत्येक सेर के लिए कहीं-न-कहीं सवासेर अवश्य मौजूद है| ऐसी अवस्था में आसपास के लोगों से अधिक योग्यता पा कर ही अपने को कोई यदि दुनिया में सबसे बड़ा मान बैठता है; तो यह उसकी भूल है| किसी दिन यदि उसे कोई अपने से बड़ा व्यक्ति मिल गया; तो उस दिन उसका सारा घमण्ड चूर-चूर हो जायगा| समझदार व्यक्ति इसीलिए कभी अपनी योग्यताओं का घमण्ड नहीं करते|

जो लोग ऐसा करते हैं, वे अविवेकी हैं| ऐसे लोग जब तक अपने से अधिक शक्तिशाली विजेता को नहीं देख लेते, तब तक अपने आप को शूरवीर मानते रहते हैं|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/3/1/1

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Wallpaper #4

Know Thyself, Recognise Thyself,
Be Immersed By Thyself & you will attain Godhood

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पापी की पीड़ा

पापी की पीड़ा

सकम्मुणा किच्चइ पावकारी

पाप करनेवाला अपने ही कर्मों से पीड़ित होता है

चोरी करनेवाला चारों ओर से सतर्क रहता है| वह फूँक-फूँक कर कदम रखता है| डरता रहता है कि कहीं कोई उसे देख न ले – रँगे हाथों पकड़ न ले| इस प्रकार अन्त तक वह भयकी वेदना से पीड़ित होता रहता है| चोरी पकड़ी जाने पर तो उसे जेल या शारीरिक दण्ड भी भोगने पड़ते हैं| Continue reading “पापी की पीड़ा” »

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सदाचार का मूल

सदाचार का मूल

नादंसणिस्स नाणं, नाणेण विणा न होंति चरणगुणा

सम्यग्दर्शन के अभाव में ज्ञान प्राप्त नहीं होता और ज्ञान के अभाव में चारित्र-गुण प्राप्त नहीं होते

दृष्टि यदि सम्यक् न हो तो मनुष्य सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता; क्यों कि जबतक दृष्टि सम्यक् परक नहीं होगी, सम्यक् की खोज नहीं की जा सकेगी और इसके लिए आवश्यक होगा कि दृष्टि स्वयं भी सम्यक् हो| सम्यग्ज्ञान से पहले सम्यग्दर्शन होना चाहिये| Continue reading “सदाचार का मूल” »

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