इच्छा हु आगाससमा अणंतया
इच्छा आकाश के समान अनन्त होती है
इसलिए कि हम कुछ चाहते हैं|
इसका अर्थ?
अर्थ यही कि इच्छा स्वयं दुःख है! Continue reading “अनन्त इच्छा” »
इच्छा आकाश के समान अनन्त होती है
इसलिए कि हम कुछ चाहते हैं|
इसका अर्थ?
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अनन्त संसार में मूढ बहुशः लुप्त (नष्ट) होते हैं
प्राणियों से मैत्री करो
वैरी वैर करता है और तब उसी में रस लेता है
कृत कर्मों का (फल भोगे बिना) छुटकारा नहीं होता
बालप्रज्ञ (अज्ञ) दूसरे मनुष्यों को चिढ़ाता है
जिसमें मोह नहीं होता, उसका दुःख नष्ट हो जाता है और जिसमें तृष्णा नहीं होती उसका मोह नष्ट हो जाता है
इन्द्रों सहित देव भी (विषयों से) न कभी तृप्त होते हैं, न सन्तुष्ट
जो क्षण है, वह कर्म का मूल है
अज्ञ पापों पर घमण्ड करता है