1 0 Tag Archives: जैन सूत्र
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निर्मल, मुक्त एवं सहिष्णु

निर्मल, मुक्त एवं सहिष्णु

सारदसलिलं इव सुद्धहियया,
विहग इव विप्पमुक्का,
वसुंधरा इव सव्वफासविसहा

मुनियों का हृदय शरद्कालीन नदी के जल की तरह निर्मल होता है| वे पक्षी की तरह बन्धनों से विप्रमुक्त और पृथ्वी की तरह समस्त सुख-दुःखों को समभाव से सहन करने वाले होते हैं

बरसातके दिनों में नदी का जो पानी चाय या कॉफी की तरह मिट्टी के मिश्रण से लाल या काला दिखाई देता है, वही शरद्काल में निर्मल हो जाता है| मुनिजनों का हृदय भी वैसा ही निर्मल होता है| उसमें विषय कषाय की मलिनता का अभाव होता है| Continue reading “निर्मल, मुक्त एवं सहिष्णु” »

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सो क्या जाने पीर पराई ?

सो क्या जाने पीर पराई ?

जे अज्झत्थं जाणइ, से बहिया जाणइ|
जे बहिया जाणइ, से अज्झत्थं जाणइ|

जो अभ्यन्तर को जानता है, वह बाह्य को जानता है और जो बाह्य को जानता है वह अभ्यन्तर को जानता है

जो अपने सुख-दुःख को समझता है, वही व्यक्ति दूसरों के दुःख-सुख को समझ सकता है- यह एक अनुभूत तथ्य है| जिसे कभी भूखा या प्यासा रहने का अवसर ही न मिला हो, वह कैसे समझ सकता है कि भूख-प्यास में किसी को कितना कष्ट होता है? Continue reading “सो क्या जाने पीर पराई ?” »

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मृदुता को अपनाइये

मृदुता को अपनाइये

माणं मद्दवया जिणे

मान को नम्रता या मृदुता से जीतें

आँधी बड़े-बड़े पेडों को उखाड़ फैंकती है; किंतु मैदान में फैली हुई दूब का कुछ नहीं बिगाड़ सकती| ऐसा क्यों? पेड़ घमण्ड से अकड़े हुए रहते हैं, किंतु दूब में नम्रता होती है अर्थात् मृदुता होती है| अकड़ से पेड़ उखड़ जाते हैं, नम्रता से दूब टिकी रहती है| वह अभिमानी व्यक्तियों का मार्गदर्शन करती है कि उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिये| Continue reading “मृदुता को अपनाइये” »

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मित्र-शत्रु कौन ?

मित्र शत्रु कौन ?

अप्पा मित्तममित्तं य, सुप्पट्ठियदुप्पट्ठियो

सदाचार-प्रवृत्त आत्मा मित्र है और दुराचारप्रवृत शत्रु

अपनी आत्मा ही मित्र है – यदि वह सुप्रवृत्त हो अर्थात् सदाचारनिष्ठ हो और अपनी आत्मा ही शत्रु है – यदि वह दुष्प्रवृत्त हो अर्थात् दुराचारनिष्ठ हो| Continue reading “मित्र-शत्रु कौन ?” »

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बुद्धिवाद

बुद्धिवाद

पा समिक्खए धम्मं

बुद्धि ही धर्म का निर्णय कर सकती है

महावीर ही थे, जिन्होंने ढाई-हजार वर्ष पहले इस सूक्ति के द्वारा बुद्धिप्रामाण्यवादका डिण्डिम घोष किया था| Continue reading “बुद्धिवाद” »

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अमनोज्ञ शब्द न बोलें

अमनोज्ञ शब्द न बोलें

तुमं तुमं ति अमणुं, सव्वसो तं न वत्तए

तू, तुम जैसे अमनोहर शब्द कभी नहीं बोलें

मॉं को और ईश्‍वर को ‘तू’ कहा जाता है, शेष सबको ‘आप’ कहना चाहिये| ‘आप’ शब्द सन्मान दर्शक है| दूसरों से बातचीत करते समय अथवा पत्र व्यवहार में इसी शब्द का प्रयोग करना चाहिये| यदि हम दूसरों के लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करेंगे; तो दूसरे भी हमारे लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करके हमें सन्मान देंगे| Continue reading “अमनोज्ञ शब्द न बोलें” »

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कीचड़ में न फँसें

कीचड़ में न फँसें

महयं पलिगोव जाणिया, जा वि य वंदणपूयणा इहं

संसार में जो वन्दन पूजन (सन्मान) है, साधक उसे महान दलदल समझे

प्रशंसा पाने का भी एक नशा होता है| नशे में जैसे आदमी औचित्य का विचार किये बिना मनमाना काम करता रहता है; वैसे ही प्रशंसा का भूखा व्यक्ति भी औचित्य की मर्यादा भूलकर जिस कार्य से अधिक प्रशंसा मिले, वही कार्य करने लगता है| Continue reading “कीचड़ में न फँसें” »

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कामासक्ति

कामासक्ति

कामेसु गिद्धा निचयं करेन्ति

कामभोगों में आसक्त रहनेवाले व्यक्ति कर्मों का बन्धन करते हैं

पॉंच इन्द्रियों में से चक्षुइन्द्रिय और श्रोत्रेन्द्रिय अर्थात् आँख और कान के विषय ‘काम’ कहलाते हैं – जैसे सुन्दर चित्र, नाटक, सिनेमा, मनोहर दृश्य, नृत्य आदि आँख के विषय हैं और श्रृङ्गाररस की कथाएँ या कविताएँ, फिल्मी गाने, विविध वाद्य, अपनी प्रशंसा, स्त्रियों या पुरुषों का मधुरस्वर, (स्त्रियों के लिए पुरुषों की और पुरुषों के लिए स्त्रियों की मीठी-मीठी बातें) आदि चक्षु एवं कान के विषय हैं| Continue reading “कामासक्ति” »

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सत्य की आज्ञा

सत्य की आज्ञा

सच्चस्स आणाए उवट्ठिए मेहावी मारं तरइ

जो मेधावी सत्य की आज्ञा में उपस्थित रहता है, वह मृत्यु के प्रवाह को तैर जाता है

जीवन में पद-पद पर अनुशासन की आवश्यकता का अनुभव होता है| विनय या अनुशासन से रहित अविनीत एवं स्वच्छन्द व्यक्ति अपने और दूसरों के कष्ट ही बढ़ाता है| ऐसी हालत में स्वपरकल्याण की तो उससे आशा ही कैसे की जा सकती है? Continue reading “सत्य की आज्ञा” »

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क्षमापना से लाभ

क्षमापना से लाभ

खमावणयाएणं पल्हायणभावं जणयइ

क्षमापना से प्रसन्नता के भाव उत्पन्न होते हैं

यदि किसीने हमारा अपराध कर दिया हो और हम उसके बदले उसे दण्ड देने में समर्थ हों, फिर भी दण्ड न दे कर उसे छोड़ दें – क्षमा कर दें तो इससे दोनों को प्रसन्नता होगी – अपराधी को भी और अपराध्य को भी| Continue reading “क्षमापना से लाभ” »

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