1 0 Tag Archives: जैन मान्यता
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मार्ग में घर

मार्ग में घर

संसयं खलु सो कुणइ
जो मग्गे कुणई घरं

साधना में संशय वही करता है, जो मार्ग में घर करना (ठहरना) चाहता है

मोक्ष हमारा अन्तिम लक्ष्य है और सदाचार सत्क्रिया वहॉं तक पहुँचने का मार्ग| Continue reading “मार्ग में घर” »

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विद्या और आचरण

विद्या और आचरण

आहसु विज्जाचरणं पमोक्खं

विद्या और आचरण से ही मोक्ष बताया गया है

जिस प्रकार चलने के लिए चक्षु और चरण – दोनों आवश्यक हैं, उसी प्रकार मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी ज्ञान और क्रिया दोनों आवश्यक हैं| Continue reading “विद्या और आचरण” »

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सुखद और दुःखद

सुखद और दुःखद

खणमित्तसुक्खा बहुकालदुक्खा

विषयभोग क्षणमात्र सुख देते हैं, किंतु बहुकाल पर्यन्त दुःख देते हैं

दिन के बाद रात और रात के बाद दिन अथवा अँधेरे के बाद उजाला व उजाले के बाद अँधेरा क्रम से आता रहता है, उसी प्रकार सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख का आगमन जीवन में होता रहता है – अनुकूल परिस्थितियॉं पा कर कभी हम हँसते हैं तो प्रतिकूल परिस्थितियॉं पा कर रोते भी हैं| Continue reading “सुखद और दुःखद” »

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कर्मों से कष्ट

कर्मों से कष्ट

सकम्मुणा विप्परियासुवेइ

अपने किये कर्मों से ही व्यक्ति कष्ट पाता है

दुनिया में विषमता है| कोई जन्म ले रहा है, कोई जन्म दे रहा है – कोई जी रहा है, कोई मर रहा है – कोई धन पा रहा है, कोई खो रहा है – कोई जाग रहा है, कोई सो रहा है – कोई हँस रहा है, कोई रो रहा है – कोई सुखी है, कोई दुःखी| Continue reading “कर्मों से कष्ट” »

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भगवती अहिंसा

भगवती अहिंसा

भगवती अहिंसा…. भीयाणं पि व सरणं

भगवती अहिंसा भीतों (डरे हुओं) के लिए शरण के समान है

भीत अर्थात् संकटग्रस्त डरा हुआ व्यक्ति अपनी सुरक्षा के लिए किसी समर्थ व्यक्ति की शरण ढूँढता है| शरण या आश्रय मिल जाने पर शरणार्थी सन्तुष्ट हो जाता है – निर्भय हो जाता है; वैसे ही भगवती अहिंसा का आश्रय लेने पर भी व्यक्ति सन्तुष्ट एवं निर्भय हो जाता है| Continue reading “भगवती अहिंसा” »

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जीवन की क्षणभुंगरता

जीवन की क्षणभुंगरता

वओ अच्चेति जोव्वणं च

आयु बीत रही है और युवावस्था भी

ज्यों-ज्यों समय बीतता जाता है, त्यों-त्यों हमारी आयु भी क्रमशः व्यतीत होती जाती है| जब से हमने जन्म लिया है – आँखें खोली हैं, दुनिया देखी है; तभी से हमारी अवस्था एक – एक क्षण घटती जा रही है| लोग समझते हैं कि हम बड़े हो रहे हैं; परन्तु वास्तविकता यह है कि वे छोटे हो रहे हैं| जितने दिन-रात बीतते जाते हैं; उतने निर्धारित आयु में से घटते जाते हैं| इस प्रकार आयुष्य प्रतिक्षण क्षीण से क्षीणतर होता जाता है| Continue reading “जीवन की क्षणभुंगरता” »

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मन के जीते जीत

मन के जीते जीत

इमेण चेव जुज्झाहि,
किं ते जुज्झेण बज्झओ ?

आन्तरिक विकारों से ही युद्ध कर, बाह्य युद्ध से तुझे क्या लाभ?

कहावत है :- ‘‘लड़ाई में लड्डू नहीं बँटते !’’ इसका आशय यह है कि युद्ध में लाभ कुछ नहीं होता| दोनों पक्षों को हानि ही उठानी पड़ती है – एक को कुछ अधिक तो एक को कुछ कम| Continue reading “मन के जीते जीत” »

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वीर्यको न छिपायें

वीर्यको न छिपायें

नो निह्नवेज्ज वीरियं

वीर्य को छिपाना नहीं चाहिये

जो शक्तिशाली हैं, उन्हें अपनी शक्ति का प्रयोग दूसरों की रक्षा के लिए करना चाहिये|

जो बुद्धिमान हैं, उन्हें अपनी बुद्धि का उपयोग दूसरों के झगड़े मिटाने में करना चाहिये| Continue reading “वीर्यको न छिपायें” »

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हाथी और कुन्थु में जीवन

हाथी और कुन्थु में जीवन

हत्थिस्स य कुन्थुस्स य समे चेव जीवे

हाथी और कुन्थु में समान ही जीव होता है

जीव और अजीव – चेतन और जड़ – स्व और पर दोनों अलग-अलग तत्त्व हैं| एक दूसरे का ये आश्रय लेते हैं, परन्तु एक दूसरे के रूप में परिवर्त्तित नहीं होते| जो जीव है वह जीव ही रहेगा व जो अजीव है, वह अजीव ही रहेगा| Continue reading “हाथी और कुन्थु में जीवन” »

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गुणनाश के कारण

गुणनाश के कारण

चउहिं ठाणेहिं सन्ते गुणे नासेज्जा कोहेणं,
पडिनिवेसेणं, अकयण्णुयाए, मिच्छत्ताभिनिवेसेणं

मनुष्य में विद्यमान गुण भी चार कारणों से नष्ट हो जाते हैं – क्रोध, ईर्ष्या, अकृतज्ञता और मिथ्या आग्रह

कुछ कारण ऐसे हैं, जिनसे प्राप्त गुणों का भी नाश हो जाता है| उनमें से पहला कारण है – क्रोध| इससे व्यक्ति विवेकहीन हो जाता है – किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाता है| Continue reading “गुणनाश के कारण” »

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