पियमप्पियं सव्वं तितिक्खएज्जा
प्रिय हो या अप्रिय-सबको समभाव से सहना चाहिये
प्रिय हो या अप्रिय-सबको समभाव से सहना चाहिये
अपने को जीतने पर सबको जीत लिया जाता है
मत्त को सब ओर से भय रहता है, किन्तु अप्रमत्त को किसी भी ओर से भय नहीं रहता
जो आत्माएँ बहुत अधिक कर्मों से लिप्त हैं, उनके लिए बोधि अत्यन्त दुर्लभ है
ऋजु या सरल आत्मा की शुद्धि होती है और शुद्ध आत्मा में ही धर्म ठहरता है
कुशील (दुराचार) बढ़ानेवाले कारणों का दूर से ही त्याग करना चाहिये
जो गोपनीय हो उसे न कहें
सारे जगत को जो समभाव से देखता है उसे न किसी का प्रिय करना चाहिये, न अप्रिय
शंकाशील व्यक्ति को कभी समाधि नहीं मिलती
पीठ का मांस नहीं खाना चाहिये अर्थात् किसी की निन्दा उसकी अनुपस्थिति में नहीं करनी चाहिये