सर्वथा काया को मोह छोड़ता हूँ – मेरी देह पर कोई परीषह जैसे है ही नहीं
कायोत्सर्ग
न भाषा न पांडित्य
कुओ विज्जाणुसासणं
विचित्र (लच्छेदार) भाषाएँ भी (दुराचारी की दुर्गति से) रक्षा नहीं कर सकतीं, फिर विद्यानुशासन (पाण्डित्य) की तो बात ही क्या?
अपने धड़कते दिल से पूछो

जिंदगी थोड़ी है, समय उससे भी कम| जैसे जैसे समय बीतता है, वैसे वैसे हम मृत्यु के निकट पहुँचते जाते हैं| आँखे खोल कर श्मशान की तरफ जाते हुए मुरदों की तरफ देखो और सोचो कि एक दिन हमारी भी यही हालत होगी| फिर क्यों न हम अनंत भव भटकने के बाद प्राप्त अति दुर्लभ अनमोल मानव भव को सफल बना ले| Continue reading “अपने धड़कते दिल से पूछो” »
कषाय-निग्रह
उपाध्याय श्री यशोविजयजी
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पालिताना के बारे में सामान्य ज्ञान
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सौन्दर्य का नाश
हे राजन्! बुढ़ापा मनुष्य के सौन्दर्य को नष्ट कर देता है
निर्मल, मुक्त एवं सहिष्णु
विहग इव विप्पमुक्का,
वसुंधरा इव सव्वफासविसहा
मुनियों का हृदय शरद्कालीन नदी के जल की तरह निर्मल होता है| वे पक्षी की तरह बन्धनों से विप्रमुक्त और पृथ्वी की तरह समस्त सुख-दुःखों को समभाव से सहन करने वाले होते हैं















