श्री पद्मप्रभु जिन स्तवन
राग : मनडुं किम हि न बाजे हो कुंथुजिन…
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मनडुं हाथन आवे हो, पद्म प्रभ!
इच्छाशक्ति का मंत्र

1. मेरे गर्भ में एक ऐसा जीवन पनप रहा है, जो कि महान् आत्मा होगा, उसके जीवन से लाखों का उपकार होगा, वह राष्ट्र और समाज का चमकता चांद होगा|
2. मेरी संतान गौर वर्ण, कमल नयन, अति सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट, तेजस्वी और संयमी होगी| मेरा लाल आनन्दी, प्रसन्न मन और दृढ संकल्प का आदर्श नररत्न होगा| Continue reading “इच्छाशक्ति का मंत्र” »
शील सुरंगीरे सुलसा महासती
राग : अरणीक मुनिवर चाल्या गोचरी
भाव : सुलसा महासतीना समकित-समता शील नी सुगंध
शील सुरंगीरे सुलसा महासती,
वर समकित गुण धारीजी;
राजगृही पूरे नाग रथिक तणी,
सुलसा नामे नारीजी.
यात्रात्रिक – साल का तीसरा कर्तव्य
अट्ठाई महोत्सव
देवताएँ प्रभुके जन्मादि कल्याणकों के उत्सव को मनाने के बाद छलकते प्रमोद-हर्षको सार्थक करने के लिए नंदीश्वर द्वीपमें जाकर अट्ठाई महोत्सव करते हैं| भगवानने बताई हुई पर्युषणआदि आराधना निर्विघ्न रूपसे बहुत ही उल्लास सभर संपन्न हुई| ससे उद्भवित हर्षको पूर्ण करने हेतु स्वयं या तो समस्त संघ इकट्ठा होकर अट्ठाई महोत्सव करता है| Continue reading “यात्रात्रिक – साल का तीसरा कर्तव्य” »
आनंद की साधना
अनन्त इच्छा
इच्छा आकाश के समान अनन्त होती है
इसलिए कि हम कुछ चाहते हैं|
इसका अर्थ?
अर्थ यही कि इच्छा स्वयं दुःख है! Continue reading “अनन्त इच्छा” »
हो अविनाशी
श्री पद्मप्रभु जिन स्तवन
राग : सुण चंदाजी…
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श्री शांतिनाथ की चरण पादुकाएँ
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