जो एक अपने को नमा लेता है; वह बहुतों को नमा लेता है
विनय
आलोचना का महत्त्व
जंबुदीवे जा हुज्ज वालुआ, ताउ हुंति रयणाइ| दिज्जंति सत्त खिते, न छुट्टए दिवसपच्छित्तं॥
जंबूद्वीप में जो मेरु वगैरह पर्वत हैं, वे सब सोने के बन जाये अथवा तो जंबूद्वीप में जो बालू है, वह सब रत्नमय बन जायें| वह सोना और रत्न यदि सात क्षेत्र में दान देवें, तो भी पापी जीव इतना शुद्ध नहीं बनता, जितना भावपूर्वक आलोचना करके प्रायश्चित वहनकर शुद्ध बनता है| Continue reading “आलोचना का महत्त्व” »
वेदों का अध्ययन
अध्ययन किये गये वेद रक्षा नहीं कर सकते
भगवान आदिनाथ का इतिहास
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दुष्कर तपस्या
तपश्चरण तलवार की धार पर चलने के समान दुष्कर है
लोभ सर्वनाशक है
लोभ सब कुछ नष्ट कर देता है
रसना पर अंकुश
सुव्रती व्यक्ति कम खाये, कम पीये और कम बोले
श्रावक के जीवनभर करने योग्य १८ कर्तव्य
उचिअं विज्जागहणं पाणिगहणं च मित्ताई॥
पाप श्रमण
जो खा-पीकर आराम से सोता है, वह पापश्रमण कहलाता है
कर्त्ता – भोक्ता
आत्मा ही सुख दुःख का कर्त्ता और भोक्ता है
हम अच्छे कार्य करते हैं; तो अपने लिए सुख का निर्माण करते हैं और यदि बुरे कार्य करते हैं; तो दुःख का निर्माण करते हैं| इस प्रकार हम स्वयं ही सुख-दुःख के निर्माता हैं, बनाने वाले हैं| Continue reading “कर्त्ता – भोक्ता” »

















