मायावी और प्रमादी फिर से गर्भ में आते हैं
गर्भ में आते हैं
लाभ और लोभ
ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों त्यों लोभ होता है और लाभ से लोभ बढ़ता रहता है
सफलता से उत्साह बढ़ता है और विफलता से वह नष्ट हो जाता है| Continue reading “लाभ और लोभ” »
असंविभागी
जो संविभागी नहीं है अर्थात् प्राप्त सामग्री को साथियों में बॉंटता नहीं है, उसकी मुक्ति नहीं होती
समय को पहचानिये
खणं जाणाहि पंडिए
हे बुद्धिमान साधक! अवशिष्ट आयु को देखते हुए समय को पहचान-अवसर का मूल्य समझ
सच्ची शिक्षा
निरट्ठाणि उवज्जए
निरर्थक शिक्षा छोड़कर सार्थक शिक्षा ही ग्रहण करें
राग द्वेष का क्षय
एगंतसोक्खं समुवेइ मोक्खं
राग-द्वेष के क्षय से जीव एकान्तसुखस्वरूप मोक्ष को प्राप्त करता है
सद्गुण साधना
तरियव्वो गुणोदहिं
सद्गुण-साधना का कार्य भुजाओं से समुद्र तैरने के समान है
राग द्वेष के कारण
दोसस्स हेउं अमणुमाहु
मनोज्ञ शब्दादि राग के और अमनोज्ञ द्वेष के कारण कहे गये हैं
कोमल प्रशंसात्मक शब्द हमें अच्छे लगते हैं और कठोर निन्दात्मक शब्द बुरे| Continue reading “राग द्वेष के कारण” »
चार संयम
वइसंजमे, कायसंजमे, उवगरणसंजमे
मनसंयम, वचनसंयम, शरीरसंयम और उपकरणसंयम – ये संयम के चार प्रकार हैं
विज्ञान और धर्म
धर्म के साधनों का विज्ञान से समन्वय करना चाहिये


















