आतुर परिताप देते हैं
आतुरता
आतुरा परितावेंति
जो व्यक्ति आतुर होते हैं अर्थात् कामातुर या विषयातुर होते हैं, वे दूसरों को परिताप (कष्ट) देते हैं – सताते हैं स्वार्थ में अन्धे बने हुए ऐसे व्यक्तियों के विवेक – चक्षु बन्द रहते हैं| उन्हें कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का भान ही नहीं रहता| अपने कण-भर सुख के लिए वे दूसरों को मणभर दुःख पहुँचाने में भी कोई संकोच नहीं करते| अपने क्षणिक सुख के लिए दूसरों को चिरस्थायी दुःख देनेवाले इन व्यक्तियों की क्रूरता अपनी चरम सीमा पर जा पहुँचती है| Continue reading “आतुरता” »
स्वपर-कल्याण में समर्थ
अलमप्पणो होंति अलं परेसिं
ज्ञानी स्व-परकल्याण करने में समर्थ होते हैं
इसी क्षण को समझें
इणमेव खणं वियाणिया
प्रतिक्षण अपनी आयु ठीक उसी प्रकार क्षीण होती जा रही है, जिस प्रकार अञ्जलि में रहा हुआ जल क्षीण होता रहता है| धीरे-धीरे एक समय ऐसा आयेगा, जब आयु सर्वथा समाप्त हो जायेगी और हम अपनी अन्तिम सॉंस छोड़ कर सदा के लिए आँखें बन्द कर लेंगे| Continue reading “इसी क्षण को समझें” »
संचित कर्मों का क्षय
तुट्टन्ति पावकम्माणि
नवं कम्ममकुव्वओ
नवं कम्ममकुव्वओ
जो नये कर्मों का बन्धन नहीं करता, उसके पूर्वसञ्चित पापकर्म भी नष्ट हो जाते हैं
निवृत्ति – प्रवृत्ति
असंजमे नियत्तिं च, संजमे य पवत्तणं
असंयम से निवृत्ति और संयम में प्रवृत्ति होनी चाहिये
जो उत्थित हैं, वे प्रमाद न करें
उट्ठिए, नो पमायए
साधकों का चक्षु
से हु चक्खु मणुस्साणं,
जे कंखाए य अन्तए
जे कंखाए य अन्तए
जिसने कांक्षा (आसक्ति) का अन्त कर दिया है, वह मनुष्यों का चक्षु है
त्रास मत दो
न य वि त्तासए परं
किसी भी अन्य जीव को त्रास मत दो
बुद्धिमान में नम्रता
नच्चा नमइ मेहावी
बुद्धिमान ज्ञान पा कर नम्र हो जाता है
अपना दुःख
एगो सयं पच्चणुहोइ दुक्खं
आत्मा अकेला ही अपना दुःख भोगता है
दुःख अपनी भूल का एक अनिवार्य परिणाम है, जिसे प्रत्येक प्राणी भोगता है| अपना दुःख दूसरा कोई बँटा नहीं सकता| चाहे कोई कितना भी घनिष्ट मित्र हो, रिश्तेदार हो, कुटुम्बी हो- अपने दुःख में वे लोग सहानुभूति प्रकट कर सकते हैं – सेवा कर सकते हैं – सहायता कर सकते हैं, परन्तु हमारा दुःख वे छीन नहीं सकते – भोग नहीं सकते | Continue reading “अपना दुःख” »


















