क्रुद्धा लुब्ध और मुग्ध हिंसा करते हैं
हिंसा के कारण
कुद्धा हणंति, लुद्धा हणंति, मुद्धा हणंति
प्रमादवश प्राणियों के प्राणों को चोट पहुँचाना हिंसा है| हिंसा से सदा दूसरों को दुःख होता है| मनुष्य क्यों दूसरों को दुःख देता है? क्यों हिंसा करता है? इस पर विचार करके ज्ञानियों ने तीन कारण बतलाये हैं| Continue reading “हिंसा के कारण” »
इसी क्षण को समझें
इणमेव खणं वियाणिया
प्रतिक्षण अपनी आयु ठीक उसी प्रकार क्षीण होती जा रही है, जिस प्रकार अञ्जलि में रहा हुआ जल क्षीण होता रहता है| धीरे-धीरे एक समय ऐसा आयेगा, जब आयु सर्वथा समाप्त हो जायेगी और हम अपनी अन्तिम सॉंस छोड़ कर सदा के लिए आँखें बन्द कर लेंगे| Continue reading “इसी क्षण को समझें” »
स्वपर-कल्याण में समर्थ
अलमप्पणो होंति अलं परेसिं
ज्ञानी स्व-परकल्याण करने में समर्थ होते हैं
संचित कर्मों का क्षय
तुट्टन्ति पावकम्माणि
नवं कम्ममकुव्वओ
नवं कम्ममकुव्वओ
जो नये कर्मों का बन्धन नहीं करता, उसके पूर्वसञ्चित पापकर्म भी नष्ट हो जाते हैं
निवृत्ति – प्रवृत्ति
असंजमे नियत्तिं च, संजमे य पवत्तणं
असंयम से निवृत्ति और संयम में प्रवृत्ति होनी चाहिये
आतुरता
आतुरा परितावेंति
आतुर परिताप देते हैं
जो उत्थित हैं, वे प्रमाद न करें
उट्ठिए, नो पमायए
साधकों का चक्षु
से हु चक्खु मणुस्साणं,
जे कंखाए य अन्तए
जे कंखाए य अन्तए
जिसने कांक्षा (आसक्ति) का अन्त कर दिया है, वह मनुष्यों का चक्षु है
अपना दुःख
एगो सयं पच्चणुहोइ दुक्खं
आत्मा अकेला ही अपना दुःख भोगता है
दुःख अपनी भूल का एक अनिवार्य परिणाम है, जिसे प्रत्येक प्राणी भोगता है| अपना दुःख दूसरा कोई बँटा नहीं सकता| चाहे कोई कितना भी घनिष्ट मित्र हो, रिश्तेदार हो, कुटुम्बी हो- अपने दुःख में वे लोग सहानुभूति प्रकट कर सकते हैं – सेवा कर सकते हैं – सहायता कर सकते हैं, परन्तु हमारा दुःख वे छीन नहीं सकते – भोग नहीं सकते | Continue reading “अपना दुःख” »
बुद्धिमान में नम्रता
नच्चा नमइ मेहावी
बुद्धिमान ज्ञान पा कर नम्र हो जाता है


















