विद्या और आचरण से ही मोक्ष बताया गया है
विद्या और आचरण
जीव विचार – गाथा 5
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सुखद और दुःखद
विषयभोग क्षणमात्र सुख देते हैं, किंतु बहुकाल पर्यन्त दुःख देते हैं
कर्मों से कष्ट
अपने किये कर्मों से ही व्यक्ति कष्ट पाता है
भगवती अहिंसा
भगवती अहिंसा भीतों (डरे हुओं) के लिए शरण के समान है
जीवन की क्षणभुंगरता
आयु बीत रही है और युवावस्था भी
मन के जीते जीत
किं ते जुज्झेण बज्झओ ?
आन्तरिक विकारों से ही युद्ध कर, बाह्य युद्ध से तुझे क्या लाभ?
वीर्यको न छिपायें
वीर्य को छिपाना नहीं चाहिये
जो बुद्धिमान हैं, उन्हें अपनी बुद्धि का उपयोग दूसरों के झगड़े मिटाने में करना चाहिये| Continue reading “वीर्यको न छिपायें” »
हाथी और कुन्थु में जीवन
हाथी और कुन्थु में समान ही जीव होता है
भक्तामर स्तोत्र – श्लोक 1
भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् |
सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुगं युगादा-
वालम्बनं भवजले पततां जनानाम् || 1 ||

















